आज प्रताप जयन्ती है ।


मेवाड़ के सिसोदिया वंश में प्रताप से पहले के सभी राजाओं को राणा कहा गया जबकि उनमें से कुछ तो वीरता और बहादुरी में प्रताप से कहीं अधिक बड़े थे । 


विशेष कर राणा संग्राम सिंह जिन्हें हम राणा साँगा के नाम से भी जानते हैं । राणा साँगा के शरीर पर युद्ध में लगे घावों की संख्या तो आज भी एक मानक के रूप में स्वीकारी जाती है । उनकी एक आँख तो राजगद्दी के लिये हुई कलह में उनके बड़े भाई पृथ्वीराज ने फोड़ दी थी । यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि उस समय दिल्ली के तख़्त पर बैठे इब्राहीम लोधी से लड़ने व उसे हराने के लिये राणा साँगा ने ही बाबर को हिन्दुस्तान आमन्त्रित किया था । अब यह बात अलग कि लोधी को हराने के कुछ समय बाद ही बाबर और साँगा का भी युद्ध हुआ जिसमें साँगा की दुर्भाग्यपूर्ण हार हुई और भारत में मुग़ल साम्राज्य की स्थापना हुई । वह युद्ध खानवा क्षेत्र में हुआ था । उस समय के चित्तौड़ से लेकर खानवा तक के रास्ते में जितने भी बड़े राजवंश थे , उनकी उस युद्ध में क्या भूमिका रही ? वे बाबर की तरफ़ से लड़े ? वे साँगा की तरफ़ से लड़े ? या वे तटस्थ रहे ? इन प्रश्नों के सही-सटीक व तथ्यात्मक रूप से तार्किक उत्तर आज भी एक खोज का विषय है । कुछ घरानों ने साँगा का साथ अवश्य दिया था । मेरा निजी व तुच्छ मत मेरी सामान्य बुद्धि से मुझे यह अवश्य समझाता है कि उस समय के राजपूताने के सभी बड़े राजवंशों ने मिलकर यदि उस युद्ध में राणा साँगा का साथ खुलकर व पूरे मन से दे दिया होता तो बाबर की हार तय थी । चाहे जितना बारूद बाबर के पास था लेकिन वह जीत तो नहीं पाता और भारत का इतिहास वह नहीं होता जो कि हुआ । कहते हैं कि उस समय भी साँगा की फ़ौज़ की संख्या बाबर की फ़ौज़ से कई गुना अधिक थी किन्तु बाबर के पास बारूद था । 


ख़ैर ! हम बात कर रहे थे प्रताप की । प्रताप मेवाड़ के पहले महाराणा कहलाये । अकबर और प्रताप का आमने-सामने का कोई युद्ध नहीं हुआ । हल्दीघाटी के युद्ध , जिसका कोई निर्णायक नतीजा कभी नहीं निकला , में प्रताप के सामने ढूँढाड़ के राजा मान सिंह थे जो अकबर के सेनापति थे और प्रताप के सेनापति थे हाकिम खां सूर । अर्थात यह दो धर्मों का नहीं , हिन्दू-मुस्लिम का नहीं दो सत्ताओं का युद्ध था ।


प्रताप अपनी प्रजा के बहुत ही लोकप्रिय शासक थे । उनकी प्रजा विशेषकर भील आदिवासी उन पर अपनी जान छिड़कते थे । उनको प्यार से कीका कहते थे । राजा राम के बाद प्रताप ही वो सबसे बड़ा उदाहरण हैं जिसमें वनवासी , आदिवासी समुदाय ने युद्ध में इस तरह खुल कर अपने राजा का साथ दिया । यहाँ यह भी रेखांकित करना मुझे ठीक लगता है कि जहां आस-पास के अन्य राजाओं ने प्रताप का खुल कर साथ नहीं दिया वहीं भील आदिवासियों ने अन्त तक प्रताप का साथ दिया ।


इस आलेख का समापन यह लिखते हुए करना चाहता हूँ कि कवि की ताकत कितनी बड़ी होती है । आज प्रताप के साथ घास की रोटी , बिलाव की कथा हमको सही व सच्ची लगती है । जबकि यह विशुद्ध रूप से एक कवि द्वारा गढ़ा गया काल्पनिक रूपक ही है । प्रताप कभी भी इतनी ख़राब स्थिति में रहे ही नहीं कि घास की रोटी खाने की नौबत आ जाये । याद रखिये कि उस समय प्रताप जंगल में अपने भील मित्रों के साथ थे । क्या यह सम्भव है कि भील उनको घास की रोटी खाने देते ? 


यह एक कवि के क़लम का कमाल है कि यह रूपक आज बिल्कुल उसी तरह सच्चा लगता है जैसा कि राधा का रूपक । गीत-गोविद/जयदेव से पहले राधा का उल्लेख कहीं नहीं है । जबकि जयदेव का काल 12वीं शताब्दी का है । कृष्ण-चरित्र पर सबसे प्रामाणिक पुस्तक भागवत मानी जाती है । भागवत में कहीं राधा नाम का कोई चरित्र है ही नहीं । एक कवि/रचनाकार की कल्पना कई बार सत्य से भी बड़ी और कालातीत हो जाती है । राधा , सन्तोषी माता , घास की रोटी , शब्दभेदी बाण आदि आदि कुछ इस तरह के रूपक हैं जो कभी घटित ही नहीं हुए लेकिन सच हो गये । राधा नाम तो इतना बड़ा हो गया कि कृष्ण के साथ नहीं उनसे पहले लिया जाने लगा ।


मैं कवि/रचनाकार की इस अद्भुत शक्ति को सलाम करता हुआ अपने इस आलेख का समापन करता हूँ । 


 लोकेश कुमार सिंह


(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)