भारत में गुर्जरों की मौजूदगी  



ऋषिकेश राजोरिया की कलम से। 

इतिहास की सुरंग में से गुजरने के बाद पता चलता है कि हम कहां से कहां तक पहुंचे। इतिहास एक सुरंग है, जिसके माध्यम से वर्तमान का इतिहास से संबंध जुड़ता है। ये सुरंगें बहुत लंबी और अंतहीन हैं। कई तरह के भ्रम और भूल भुलैयाएं हैं। सीधा रास्ता तब से बनता दिखाई देता है, जब भाषा, लिपि, लेखन, दस्तावेजीकरण आदि की शुरूआत हुई। तब तक समुद्रपारीय यातायात भी विकसित हो चला था और नाविकगण जहाजों से समुद्र पार कर अन्य द्वीपों, देशों तक पहुंचने लगे थे। जो इतिहास प्रामाणिक तौर पर उपलब्ध है, उससे संकेत मिलता है कि गुप्त वंश, मौर्य वंश के पतन के बाद हूणों ने भारत में शासन किया। बाद में हूणों के वंश की कई शाखाएं बनीं और गुर्जरों ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों पर शासन किया।

गुर्जरों के एक प्राचीन राजवंश ने गुजरात पर शासन किया था। चाप, चावड़ा, छावड़ा, चपराणा, चपोत्कट, चावड़ी, छावड़ी गुजरात के राजवंश के नाम हैं। गुजरात में ईसवी 690 और 942 के दौरान गुर्जरों का वर्चस्व रहा। ये लोग हैरतअंगेज तीरंदाजी से विश्व प्रसिद्ध हो चुके थे। मध्य प्रदेश के चंबल संभाग में चपराणा और हूण गुर्जर पाग-पटल भाई के रूप में माने जाते थे। आठवीं शताब्दी के प्रारंभ में गुर्जर प्रतिहार उज्जैन के शासक थे। नाग भट प्रथम ने उज्जैन में गुर्जरों के इस नए राजवंश की नींव रखी थी। पंवारों का उदय भी हूण गुर्जरों की एक शाखा के रूप में माना जाता है।

राजस्थान के कोटद्वार में बडोली का एक शिवमंदिर पंवार वंश के हूण राजा ने बनवाया था। मालवा पर लंबे समय तक हूणों की मजबूत पकड़ थी। पंवारों सहित गुर्जरों का प्रारंभिक इतिहास अरबुदा या आबू क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। राजस्थान में हूण गुर्जर मुख्य रूप से अलवर, भरतपुर, दौसा, अजमेर, सवाई माधोपुर, टोंक, बूंदी, कोटा, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा जिलों में पाए जाते हैं। अलवर जिले के सात गांव हूण गुर्जरों के गांव कहलाते हैं। अलवर जिले की तहलसील लक्ष्मणगढ़ में बांदका हूण गुर्जरों का प्रमुख गांव है। भरतपुर जिले में डीग के पास महमदपुर गुर्जरों का गांव है। अधावली गांव में हूण गुर्जरों के कुछ परिवार रहते हैं। भरतपुर जिले के बसावर क्षेत्र में इटामदा और महतोली हूण गुर्जरों के गांव हैं।

दौसा जिले में सिकंदरा के पास पीपलकी हूण गुर्जरों का प्रसिद्ध गांव है। अजमेर जिले में नारेली, लवेरा, बासेली, घोड़दा, भेरूखेड़ा हूण गुर्जरों के प्रमुख गांव हैं। टोंक जिले में सरोली, गांवड़ी, कल्याणपुर, बसनपुरा, चांदरी माता और रंगविलास गांवों में हूण गुर्जरों का निवास है। पूर्व मध्य काल में कोटा-बूंदी का क्षेत्र हूण प्रदेश कहलाता था। बूंदी क्षेत्र में रामेश्वर महादेव, भीमलत और झर महादेव मंदिर हूणों के बनवाए गए प्रसिद्ध शिव मंदिर हैं। कोटा में हूणराज ने शिव मंदिर बनवाया था। बूंदी जिले में राणीपुरा, नरसिंहपुरा, रामपुरा, झरबालापुरा, सुसाडिया, नीम का खेड़ा, झाल आदि गुर्जरों के प्रसिद्ध गांव हैं। हिंडोली में नेहडी, सहसपुरिया, टरडक्या, टहला, सलावलिया और खंडिरिया हूण गुर्जरों के गांव हैं।

कोटा जिले में रोजड़ी, राजपुरा, पीतांबरपुरा हूण गुर्जरों के मुख्य गांव हैं। चित्तौड़गढ़ की बेगू तहसील में पारसोली हूण गुर्जरों का प्रमुख गांव है। भीलवाड़ा जिले की जहाजपुर तहसील में टिटोदा, बरोदा, मोतीपुरा, मोहनपुरा, गांगीथला और शाहपुरा तहसील में बच्छ खेड़ा हूण गुर्जरों के गांव हैं। भीलवाड़ा की केकड़ी तहसील के गणेशपुरा गांव में हूण गुर्जर निवास करते हैं। छठी सदी के पूर्वार्ध में मध्य प्रदेश के ग्वालियर क्षेत्र में हूणों का आधिपत्य था। चंबल संभाग, ग्वालियर और उसके आसपास के जिलों के कई गांवों में हूण गुर्जरों की बिखरी हुई आबादी है। मध्य प्रदेश में हूण गुर्जर भोपाल तक पाए जाते हैं। महाराष्ट्र के दोड़े गुर्जरों में हूण गोत्र है। खानदेश गजेटियर के मुताबिक दोड़े गुर्जरों के 41 कुल हैं, जिनमें से एक अखिलगढ़ के हूण हैं।

हूण शासक तोरमाण ने उत्तर पश्चिमी भारत में अपना शासन स्थापित किया था। तोरमाण के बेटे मिहिरकुला का शासन ईसवी सन 502 से 542 के दौरान बताया जाता है। तब हूण गुर्जरों की राजधानी सकाला में थी, जो अब आधुनिक पाकिस्तानी पंजाब के सियालकोट में है। मिहिरकुल ने सकाला-सियालकोट से पूरे भारत पर शासन किया था। तेरहवी शताब्दी में लिखे गए कल्हण के ग्रंथ राजतरंगिणी के अनुसार मिहिरकुला हूण ने श्रीलंका के राजा पर हमला कर उसे भी परास्त कर दिया था। मिहिरकुला ने ग्वालियर और चित्तौड़ सहित कई किले बनवाए थे।

पंजाब में लोककथा है कि राजा शालिवाहन और उनके बेटे रिसालू भाटी वंश के थे। शालिवाहन ने सियालकोट शहर को फिर से स्थापित किया और रावी-चिनाब नदियों के बीच फैले क्षेत्र पर शासन किया था। सियालकोट क्षेत्र सोलहवीं शताब्दी में गुर्जरों का गढ़ था। बाबरनामा में लिखा है- ‘अगर कोई हिंदुस्तान में जाता है तो जाट और गुर्जर हमेशा पहाड़ी से अनगिनत भीड़ में नीचे गिरते हैं। ये बदकिस्मत लोग बेहूदा जालिम हैं। पहले उनके कर्मों ने हमारी चिंता नहीं की क्योंकि क्षेत्र एक दुश्मन का था। लेकिन उन्होंने वही बेहूदा काम किया जिसके बाद हमने उस पर कब्जा कर लिया। जब हम सियालकोट पहुंचे, तो उन लोगों पर झपट्टा मारा, जो शहर से हमारे शिविर की तरफ आ रहे थे। मेरे पास बुद्धिहीन सेना थी और उनमें से कुछ को टुकड़ों में काटने का आदेश दिया।‘

फिलहाल सियालकोट पाकिस्तान में पंजाब प्रांत के उत्तर-पूर्व में चिनाब नदी के पास कश्मीर की पहाडि़यों की तलहटी में लाहौर से करीब 125 किलोमीटर दूर स्थित है और गुर्जर आबादी वाले क्षेत्रों से घिरा हुआ है। यह उत्तर में जम्मू, उत्तर-पश्चिम में गुजरात, पश्चिम में गुजरांवाला और दक्षिण में नरोवाल तक फैला हुआ है। सियालकोट में ही करीब 25 फीसदी गुर्जर आबादी है। पाश्चात्य इतिहासकारों के मुताबिक भारत में इस्लाम के अनुयायी मुसलमान अरब देशों के व्यापारी के रूप में आने लगे थे। मान्यता है कि भारत में राम वर्मा कुलशेखर के आदेश पर पहली मस्जिद का निर्माण ईसवी सन 629 में केरल के कोलंगालूर में हुआ था।

मुस्लिम इतिहासकार मलिक बिन देनार ने राम वर्मा कुलशेखर को भारत का पहला मुसलमान माना है। इसके बाद भारत में धर्म परिवर्तन का सिलसिला शुरू हो चुका था और कई लोग मुसलमान बनने लगे थे। आठवीं शताब्दी में मोहम्मद बिन कासिम की अरब सेना ने पहली बार सिंध प्रांत (फिलहाल पाकिस्तान में) पर हमला कर वहां शासन स्थापित किया था और सिंध उमय्यद खलीफा का पूर्वी प्रांत बन चुका था। दसवीं शताब्दी शुरू होने के चार-पांच दशकों के दौरान गजनी के महमूद ने पंजाब को गजनवी साम्राज्य से जोड़ा और भारत में कई जगह हमले किए। बारहवीं शताब्दी तक मुसलमान शासक दिल्ली में सल्तनत स्थापित करने की तैयारी करने लगे थे।

इतिहास खंगालने पर स्पष्ट होता है कि जब भारत में मुसलमानों के हमले शुरू हुए, उस समय भारत के अधिकांश हिस्सों पर हूण गुर्जरों का शासन था। भारत के ज्यादातर हिस्सों पर मुसलमानों का शासन स्थापित होने के बाद हिंदू शब्द का चलन शुरू हुआ था। उसके कई वर्षों के बाद हिंदुत्व शब्द अस्तित्व में आया। अब लोकतंत्र में हिंदुत्व के आधार पर राजनीति हो रही है। सभी गैर मुसलमानों को हिंदुत्व के नाम पर राजनीतिक रूप से संगठित करने का प्रयास किया जा रहा है। मुसलमानों के भारत में आगमन से पहले ही भारतीय लोग कई भागों में बंट चुके थे। इससे पहले हूणों और शकों ने भी भारत पर हमले किए थे और बौद्ध धर्म के साथ ही जैन धर्म का भी विस्तार हो चुका था। 

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)