हम 

राम को मानते हैं

लेकिन

मर्यादित नहीं हैं

हम

कृष्ण को मानते हैं

लेकिन

नहीं छूटती हमसे 

फल की आशा

हम

हुसैन को मानते हैं

लेकिन

कट्टर हैं यज़ीद की तरह

हम

ईसा को मानते हैं 

लेकिन

हमीं चढ़ाते हैं करुणा को

सलीब पर

हम 

महावीर को मानते हैं

लेकिन

हिंसा है हमारे भीतर

हम

बुद्ध को मानते हैं

लेकिन

जन्मजात अशान्त हैं

हम 

नानक को मानते हैं

लेकिन

रखते हैं कटार को

कड़े से ऊपर

हम

गाँधी को मानते हैं 

लेकिन

हममें कोई आग्रह नहीं

सत्य के प्रति

हम दोगले हैं

हम भ्रष्ट हैं

हम बेईमान हैं 

हम

नहीं मानते इनमें से 

किसी को भी 

सच तो यह है !


लोकेश कुमार सिंह

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)