रीति-रिवाज, कुरीतियां और अंधविश्वास
ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।
हिंदुत्व की अब तक की विवेचना से स्पष्ट होता है कि इसमें बहुत धांधली है। महाभारत के बाद जो समाज का स्वरूप बना, उसमें तरह-तरह के रीति-रिवाज बने और उनका पालन करना धर्म मान लिया गया। जो इन रीति-रिवाज का पालन नहीं करते हैं, उन्हें धर्म विरोधी मान लिया गया। इसी काल में तंत्र-मंत्र जनित अंधविश्वासों का प्रचलन बढ़ा। समाज में तरह-तरह के टोटके फैल गए। टोने-टोटकों के आधार पर बीमारी का उपचार होने लगा। निजी खुन्नस में दूसरों को नुकसान पहुंचाने वाले काम हुए।
धार्मिक समाज के निर्माण के नाम पर तमाम तरह की कुरीतियां फैल गईं, जिनमें सती प्रथा, बाल विवाह जैसी कुरीतियां प्रमुख है। धर्म पालन को चरित्र से जोड़ दिया गया और धर्म के आधार पर चरित्र बनाए रखने की जिम्मेदारी स्त्रियों पर छोड़ दी गई। स्त्रियों के लिए अपने पति, रिश्तेदार और पर पुरुष में अंतर पैदा किया गया। स्त्रियों का पर पुरुष से बात करना अपराध घोषित हुआ और यौन व्यवहार को लेकर उनके आचरण के कई नियम बना दिए गए। इसी सिलसिले में घूंघट प्रथा प्रचलित हुई।
चरित्र को सीधे यौन व्यवहार से जोड़ दिया गया। पति को परमेश्वर मानने वाली स्त्रियां धर्म परायण मानी जाने लगी। इस संबंध में सत्यवान-सावित्री जैसी कथाएं रचकर पतिव्रत धर्म का महत्व प्रतिपादित किया गया। यह सब वेदों और पुराणों की रचना हो जाने के बाद शुरू हुआ। विवाह के लिए स्त्रियों के अपहरण की परंपरा पहले से चल रही थी। कई राजा सुंदर स्त्री में रुचि पैदा होने पर उससे यौन संबंध स्थापित करने के बाद भूल जाते थे। सक्षम लोग प्रेम प्रदर्शन करते हुए स्त्रियों से यौन संबंध बना लेते थे। जैसे राजा दुष्यंत ने शकुंतला के साथ किया था या वृहस्पति ने अपने भाई की पत्नी के साथ किया।
दुष्यंत और शकुंतला के मिलन से भरत का जन्म हुआ। भरत ने शासन किया और उनके पांच पुत्र हुए। भरत ने पहली बार अपना उत्तराधिकारी चुनने में यह नियम लागू किया कि राज्य का उत्तराधिकार संभालने के लिए सिर्फ राजा का पुत्र होना आवश्यक नहीं है, उसमें योग्यता भी होनी चाहिए। भरत ने वृहस्पति के नाजायज पुत्र विरथ को राज्य सौंपा, जिसका जन्म वृहस्पति के भाई की पत्नी ममता के गर्भ से हुआ था। वृहस्पति ने अपने भाई की पत्नी के साथ यौन संबंध बना लिए थे, जिसके परिणाम स्वरूप विरथ का जन्म हुआ था। इस युवक को भरत ने राजा के रूप में चुना, जो एक महान राजा साबित हुआ और उसने बुद्धिमानी से शासन किया। इसके बाद से विश्व के इस विशेष भूभाग का नाम भारत पड़ा।
विरथ की चौदह पीढ़ी के बाद शांतनु हुए। शांतनु कौरवों और पांडवों के परदादा थे। शांतनु एक बार शिकार पर थे तो गंगा को देखकर मोहित हो गए। उन्होंने गंगा से विवाह कर लिया। गंगा इस शर्त पर विवाह के लिए राजी हुई कि विवाह के बाद वह जो भी करेगी, उसमें कोई रोक-टोक नहीं होगी। शांतनु ने शर्त मंजूर कर ली। उसके बाद पुत्र जन्म का जन्म हुआ तो गंगा ने उसे नदी में बहा दिया। वह स्त्री रूप में स्वयं गंगा ही थी। इस तरह गंगा ने सात बच्चे नदी में बहा दिए। जब वह आठवें बच्चे को नदी में बहाने के लिए गई तो शांतनु ने उन्हें रोक दिया और बच्चे का जीवन बचाने की प्रार्थना की।
शर्त टूटने पर गंगा यह कहते हुए चली गई कि सोलह वर्ष बाद यह बच्चा आपको मिल जाएगा। सोलह वर्ष बाद उसने वह बालक देवव्रत शांतनु को सौंप दिया। शांतनु ने देवव्रत को होनहार देखकर अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। देवव्रत ने भली भांति राजपाट संभाल लिया, तब शांतनु फिर से शिकार और अन्य स्त्रियों से प्रेम करने लगे। वह सत्यवती को देखकर उसके प्रेम में पड़े और सत्यवती के पिता के पास उसका हाथ मांगने पहुंच गए। सत्यवती के पिता ने शर्त रखी कि सत्यवती का पुत्र ही कुरु वंश का उत्तराधिकारी बनेगा, अन्यथा सत्यवती को भूल जाइए।
शांतनु पहले ही देवव्रत को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर चुके थे, इसलिए वह निराश हो कर महल में लौट आए और उदास रहने लगे। देवव्रत उनका आज्ञाकारी पुत्र था। उसने पता लगा लिया कि शांतनु क्यों उदास हैं। तब उसने प्रतिज्ञा की कि वह कभी राजा नहीं बनेगा और सत्यवती के पुत्र ही राजा बनेंगे। वह कभी विवाह नहीं करेगा। इसके बाद से देवव्रत भीष्म कहलाने लगे। इसके बाद सत्यवती ने शांतनु से विवाह कर लिया।
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)


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