भारत में हूण वंश का शासन
ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।
गुप्त वंश के साम्राज्य का पतन होने के बाद कुछ समय भारत हूणों के अधिकार क्षेत्र में रहा। हूण खानाबदोश जाति के थे। उन्हें बंजारा कहा जाता था। उपलब्ध इतिहास के अनुसार यह जाति चीन से सटे क्षेत्र में निवास करती थी। बाद में यह दो भागों में बंटी। एक हिस्से के हूण वोल्गा के पूर्वी क्षेत्र में जाकर बस गए और दूसरे हिस्से के हूणों ने ईरान पर हमला किया और वहां के सासाणी साम्राज्य को अपदस्थ कर वहां शासन करने लगे। उन्होंने ईसवी सन 370 में यूरोप में रोमन साम्राज्य को हटाकर हूण साम्राज्य खड़ा कर लिया था। ईसवी सन 483 में फारस के बादशाह फीरोज को हूण राजा खुशनेवाज ने हराया। फीरोज की युद्ध में ही मौत हुई।
हूणों ने फीरोज के उत्तराधिकारी कुबाद से दो वर्ष तक कर वसूल किया और इसी दौरान हूणों ने भारत में हमले शुरू किए। यूरोप पर हमला करने वाले हूणों का नेता अट्टिला था। हूणों ने यूरोप के रोमन साम्राज्य को ध्वस्त कर दिया था। भारत पर हमला करने वाले हूण श्वेत और यूरोप पर हमला करने वाले अश्वेत हूण कहलाते थे। भारत पर हमला करने वाले हूणों के नेताओं में तोरमाण और मिहिरकुल या मिहिर गुल शामिल थे। तोरमाण ने स्कंदगुप्त के शासन काल में भारत पर हमला किया था। मिहिर गुल हूण राजवंश का सबसे प्रतापी सम्राट था और महान शिवभक्त था। मिहिर गुल की अगुवाई में हूणों ने पूरे उत्तर भारत में गुप्त साम्राज्य की जड़ें हिला दी थी। आज जिसे पाकिस्तान और अफगानिस्तान कहा जाता है, तब उस क्षेत्र में हूणों ने गुर्जर साम्राज्य की स्थापना कर ली थी। मिहिर गुल ने कश्मीर को राजधानी बनाकर पंजाब, अफगान, कश्मीर, बलूचिस्तान, राजस्थान आदि क्षेत्रों में अपना साम्राज्य कायम रखा।
गुर्जर राजाओं की उपाधियां होती थीं, गुर्जराधिराज, गुर्जरेश्वर, गुर्जर नरेश आदि। गुर्जर प्रतिहार राजवंश हूण गुर्जरों की ही एक शाखा है। उस समय भारत में बौद्ध और जैन धर्म फैलने लगे थे। गुर्जर राजाओं के शासनकाल में पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में बौद्ध धर्म का विस्तार हुआ। मिहिरकुल किसी कारण से बौद्धों से नाराज हो गया। तब उसने बौद्ध संतों को प्रताडि़त करने और हजारों बौद्ध मठों को नष्ट करने का सिलसिला चलाया और फिर से सनातन धर्म की स्थापना में योगदान दिया। गुर्जर राजाओं ने हजारों शिव मंदिरों का निर्माण करवाया। जैन धर्म और बौद्ध साहित्य में मिहिरकुल को कल्कि का अवतार भी माना जाता है।
पांचवीं शताब्दी के मध्य ईसवी सन 450 के आसपास हूण गांधार क्षेत्र के शासक थे। तब उन्होंने समस्त सिंधु घाटी प्रदेश को जीत लिया था। कुछ ही समय बाद उन्होंने मारवाड़ और पश्चिमी राजस्थान के इलाके भी जीत लिए थे। ईसवी सन 495 के आसपास हूणों ने तोरमाण की अगुवाई में गुप्तों से पूर्वी मालवा छीन लिया था। एरण और सागर जिले में वराह की प्रतिमा पर तोरमाण के अभिलेख से इसकी पुष्टि होती है।
तोरमाण गुर्जर नेता था। जैन ग्रंध कुवयमाल के अनुसार तोरमाण चंद्रभागा नदी के किनारे स्थित पवैय्या नगरी से भारत पर शासन करता था। यह पवैय्या ग्वालियर के पास स्थित है। उस क्षेत्र में कई लोगों का उपनाम भी पवैया है। तोरमाण के बाद मिहिरकुल हूणों का राजा बना। मिहिरकुल ने पंजाब में सियालकोट को अपनी राजधानी बनाया था। मिहिरकुल के करीब सौ साल बाद चीनी यात्री व्हेन सांग 629 ईसवी में भारत आया। उसने अपने संस्मरण में मिहिरकुल का जिक्र किया है। गांधार में मिहिरकुल के भाई ने बगावत कर उत्तर भारत का साम्राज्य हथिया लिया। गांधार से वंचित होने के बाद मिहिरकुल ने कश्मीर में राज्य स्थापित कर लिया।
हाडा लोगों की बहुलता के कारण राजस्थान में कोटा-बूंदी का इलाका हाड़ोती कहलाता है। राजस्थान का यह हाड़ोती संभाग कभी हूण प्रदेश हुआ करता था। आज भी इस इलाके में हूणों के गोत्र के कई गुर्जर बहुल गांव हैं। हूण साम्राज्य का पतन होने के बाद वह कई शाखाओं में बंट गया था। इनमें से गुर्जर प्रतिहार प्रमुख हैं, जिन्होंने ज्यादातर क्षेत्रों पर शासन किया। गुर्जर प्रतिहारों को तोमर कहा जाता था। गुर्जर प्रतिहारों ने हूणों की विरासत को ही आगे बढ़ाया। उस समय मालवा और ग्वालियर क्षेत्र में विष्णु के वाराह अवतार की पूजा शुरू हुई। मध्य प्रदेश के सागर जिले में स्थित एरण में वाराह की विशालकाय प्रतिमा स्थापित कराई गई थी। यह भारत में प्राप्त वाराह की पहली प्रतिमा थी।
गुर्जरों की शाखाओं में से एक चालुक्य वंश ने नर्मदा नदी के पार दक्षिणी क्षेत्रों पर शासन किया। चालुक्यों का निशान भी वाराह था। सिक्कों पर भी वाराह अंकित रहता था। चालुक्यों ने हूण नाम के सिक्के भी चलवाए। गुर्जरों की एक अन्य शाखा ने गुजरात में शासन स्थापित किया। चालुक्य वंश के लोग आज भी महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में पाए जाते हैं। पाश्चात्य साहित्यकारों ने चालुक्यों को हूण मूल का गुर्जर माना है। गुर्जरों के एक अन्य राजवंश चौहान ने राजस्थान के अजमेर इलाके में शासन किया था। इन्हें चेची गुर्जर कहा जाता था।
हूणों की शाखा के रूप में विकसित तंवर वंश ने दिल्ली में शासन किया। इन्हें तोमर भी कहा जाता है। इस वंश के कई लोगों का वर्चस्व दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में आज भी बना हुआ है। आज भी महरौली क्षेत्र में 12 गांव तोमरों के हैं। तोमरों ने 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ जबर्दस्त लड़ाई लड़ी थी। इसकी शुरूआत मेरठ के कोतवाल (पुलिस प्रमुख) धन सिंह गुर्जर ने की थी। उन्होंने 10 मई 1857 को अंग्रेजों के खिलाफ बगावत कर दी थी। उन्होंने आधी रात को जेल से 836 कैदियों को छुड़वाकर जेल में आग लगा दी थी। इसके बाद उन्होंने 12 दिनों तक मैटलहाउस पर कब्जा कर ब्रिटिश सेनाओं के लिए सभी आपूर्ति काट दी थी और दिल्ली की स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी। इसके बाद अंग्रेज सरकार ने धन सिंह को गिरफ्तार कर मेरठ के एक चौराहे पर फांसी पर लटका दिया था।

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