ब्यूरो रिपोर्ट

राजस्थान की पारंपरिक वेशभूषा में सजी-धजी महिलाएं। छोटी छोटी बच्चियां और उनके आगे चल रहे दूल्हा दुल्हन के परिवेश में बींद और बीनणी। जी हां, यह नजारा है धूलंडी त्योहार के बाद शुरू हुए गणगौर पूजा के बीच के नजारे का। राजस्थान की महिलाओं के सबसे बड़े त्यौहार गणगौर की पूजा के बीच हर परिवेश में यह नजारा शीतला अष्टमी के दिन अलग-अलग रंगों में बिखरा नजर आता है। धूलंडी के दिन शुरुआत होती है गणगौर पूजा की औऱ इसी दिन होली की राख से बनाई जाती है गणगौर की प्रतीक पिंडलिया । 


इसकी 8 दिन पूजा के बाद गणगौर आकार लेती है अपने साकार स्वरूप का। यानी शीतला अष्टमी के दिन उन पिंडलियों का विसर्जन करके इनकी जगह लाई जाती है मिट्टी से बनी मूर्तियां! जो कि शिव पार्वती के रूप में ईसर गणगौर का रूप कहीं जाती है। शीतला अष्टमी के दिन शाम को ही पिंडलियों का विसर्जन करने के बाद शिव पार्वती के विवाह के रूप में दो कुंवारी कन्याओं को दूल्हा और दुल्हन के रूप में बनाकर अपने क्षेत्र के पास में ही स्थित पार्क में गाजे-बाजे के साथ ले जाया जाता है और फिर पीपल का पेड़ या फिर अगर पीपल नहीं हो तो किसी भी हरे भरे पेड़ के बीच में महिलाएं ही मंत्रोचार करती है। फेरे होते हैं और एक  प्रतीकात्मक रूप से विवाह संपन्न कराने की प्रक्रिया पूरी हो जाती है। फिर गाजे बाजे के साथ वापस गणगौर पूजने के स्थान पर पहुचते है और इस समारोह में शामिल सभी महिलाओं को अल्पाहार सहित कई उपहार भी दिए जाते हैं साथ में बधाई गान भी होते हैं। देखा जाए तो गणगौर का त्योहार राजस्थान की महिलाओं के लिए एक धार्मिक ऊर्जा देने वाला त्योहार है। क्योंकि एक यही त्यौहार है जो लगातार 16 दिन तक चलता है। सुहागिन महिलाएं और कुंवारी कन्याएं इसमें विशेष रूप से उत्साह से भाग लेती है। सबको रोजाना एक नियत समय पर गणगौर माता की पूजा करने का इंतजार रहता है या यूं कहें कि चाव रहता है। इस बार तिथियों के परिवर्तन के चलते और करारे वारो के फेरे में शीतलाष्टमी का त्यौहार लगभग 2 दिन पहले आ गया लेकिन गणगौर पूजा सतत 16 दिन तक लगातार चलेगी।