वेद, उपनिषद और षड्दर्शन


ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।    

हिंदुत्व नामकरण होने से पहले भारत में करीब एक दर्जन दर्शन अस्तित्व में आ चुके थे। इनमें से छह वेदों पर आधारित हैं। वेदों का रचनाकाल स्पष्ट नहीं है। वेद भारतीय धर्म, दर्शन, साहित्य, संस्कृति सभी के मूल स्रोत माने जाते हैं। वेदों की रचना में हजारों साल का समय लगा है। भारतीय धार्मिक परंपरा में वेदों को नित्य, अपौरुषेय और ईश्वरीय माना जाता है। कई ऋषियों के सामूहिक प्रयास से वेदमंत्रों की रचना हुई है। वेदमंत्रों के आधार पर वैदिक साहित्य का विकास हुआ है, जो चार चरणों में माना जाता है। संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद। मंत्रों और स्तुतियों के संग्रह को संहिता कहते हैं। संहिता के मंत्र यज्ञ के मौके पर देवताओं की स्तुति के लिए गाए जाते थे। आज भी धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यों के मौके पर इनका गायन होता है।

ब्राह्मण ग्रंथों में यज्ञों की विधि, उनके प्रयोजन, फल आदि का विवेचन है। आरण्यक ग्रंथों में आध्यात्मिकता की ओर झुकाव है जो वानप्रस्थियों के लिए उपयोगी है। उपनिषदों में आध्यात्मिक चिंतन की प्रधानता है। ब्राह्मण ग्रंथों में शतपथ, तांडय आदि प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण है। ऐतरेय और तैत्तिरीय आदि नाम के आरण्यक और उपनिषद दोनों हैं। इनके अलावा उपनिषदों में ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, मांडूक्य आदि प्रमुख हैं। ये सभी भारतीय चिंतन के आदिस्रोत हैं। वेदों को दर्शन में शामिल नहीं किया गया है। दर्शन उपनिषद काल से अस्तित्व में आने लगा था। दर्शन का अर्थ है देखना। जिसके द्वारा देखा जाए या जिसमें देखा जाए। यह देखना प्रकृति में आत्मा और परमात्मा के संबंधों के बारे में संकेत करता है। उपनिषद काल के बाद भारतीय जीवन में षट्दर्शन अस्तित्व में आए। ये सभी छह दर्शन वेदों पर आधारित और आस्तिकता से परिपूर्ण है।

षट्दर्शन में न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदांत शामिल हैं। न्याय दर्शन के प्रणेता महर्षि गौतम हैं। वैशेषिक दर्शन के रचयिता महर्षि कणाद हैं। सांख्य दर्शन की रचना महर्षि कपिल ने की। महर्षि पतंजलि ने योग दर्शन प्रस्तुत किया। मीमांसा दर्शन मीमांसासूत्र पर आधारित है, जिसकी रचना महर्षि जैमिनी ने की थी। वेदांत दर्शन वेदों का अंतिम सिद्धांत माना जाता है, जिसके रचयिता महर्षि व्यास हैं, जिन्हें वेद व्यास भी कहा जाता है। वेदों के अध्ययन और उनके आधार पर दर्शन का सिलसिला इसके बाद समाप्त हो गया। हम कह सकते हैं कि महाभारत के बाद भारत में बनी परिस्थितियों के कारण यह विकास रुक गया होगा।

वेद आधारित षट्दर्शनों में विष्णु और शिव में भेद करने वाली बातें नहीं हैं। यह भेद महाभारत के बाद जो भारतीय समाज विकसित हुआ, उसमें पैदा हुआ होगा। महाभारत की रचना वेद व्यास ने की थी, ऐसा सभी मानते हैं। महाभारत लिखने के लिए उन्होंने गणेशजी की सेवाएं ली थीं, जो शिव-पार्वती के पुत्र माने जाते हैं। अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत के बाद विष्णु भक्तों और शिव भक्तों के अलग-अलग समूह उभरने लगे होंगे। उस समय के अलग-अलग राजाओं में कुछ विष्णु भक्त होंगे और कुछ शिव भक्त। उनमें परस्पर प्रतिद्वंद्विता रही होगी। महाभारत के बाद भारत में वेदांत पर आधारित ही अनेक संप्रदाय बन चुके थे, जिन्हें अद्वैत, द्वैत, द्वेताद्वैत, विशिष्टिाद्वैत आदि नामों से जाना जाता है। इनमें भी आपस में परस्पर मतभेद पैदा हो चुके थे।

यह अनुमान आजादी के बाद भारत सरकार की तरफ से शक संवत को महत्व देने से पुष्ट होता है। हिंदुओं में ज्यादातर लोग विक्रम संवत के आधार पर कालगणना करते हैं, जबकि शक संवत के अनुसार काल गणना भी विक्रम संवत के अनुरूप है। विक्रम संवत विक्रमादित्य के आधार पर माना जाता है, जबकि शक संवत के बारे में कोई सर्वमान्य राय नहीं है। शक संवत का नाम शालिवाहन है। पौराणिक कथाओं में शक वंश की उत्पत्ति सूर्यवंशी राजा नरिष्यंत से मानी जाती है। नरिष्यंत को राजा सगर ने शासन से हटाकर देश से निकाल दिया था और म्लेच्छ घोषित कर दिया था। तब शक मध्य एशिया में शाकल द्वीप पर जाकर बस गए थे। वह शाकल द्वीप आजकल सीरिया नाम से जाना जाता है। शकों का निष्कासन उस जमाने में शिव भक्तों और विष्णु भक्तों के बीच खाई पैदा होने का संकेत है। शकों के निष्कासन के बाद भारत में वैष्णवों का वर्चस्व बन गया था।

शाकल द्वीप पर बसने के बाद शकों की ताकत बढ़ गई और उन्होंने एक बड़े क्षेत्र पर अपना आधिपत्य स्थापित करने के बाद भारत वर्ष में हमले करने शुरू किए। तक्षशिला, मथुरा, महाराष्ट्र और उज्जैन में शकों का शासन स्थापित हो चुका था। वैष्णव लोग शकों के खिलाफ थे। विक्रमादित्य ने शकों का शासन समाप्त कर दिया था, इसलिए उनकी याद में विक्रम संवत की शुरूआत हुई थी। शक संवत और विक्रम संवत में जो विवाद है, वह वैष्णवों की ओर से उठाया गया प्रतीत होता है, जबकि यह प्रमाणित है कि शक भी मूल रूप से भारतीय ही थे। भारत सरकार ने इसी आधार पर शक संवत को भारतीय संवत घोषित किया है। इस समय हिंदुओं में आम तौर पर प्रचलित जो विचारधारा है, जिसे हम हिंदुत्व कहते हैं, उसमें वैष्णवों की प्राथमिकता है।

महाभारत के बाद भारत के सनातन धर्मियों में षट्दर्शनों के अलावा कुछ और दर्शन अस्तित्व में आए। इनमें लोकायत, शैव एवं शाक्त दर्शन प्रमुख हैं। उन्हें भी प्रमुख हिंदू दर्शनों में शामिल किया गया है। शैव दर्शन में शिव की और शाक्त में शक्ति (देवी) की उपासना को प्रमुखता दी गई है। इसके अलावा ब्रहस्पति सूत्र पर आधारित चार्वाक दर्शन है, जिसके प्रणेता महर्षि चार्वाक माने जाते हैं। यथार्थवाद और भौतिकवाद पर आधारित इस दर्शन को नास्तिकवाद का आधार माना जाता है। इसमें आत्मा, परमात्मा, स्वर्ग आदि को काल्पनिक बताया गया है। इसके अनुसार भूतों के संयोग से देह में चेतना पैदा होती है, जो मौत के बाद समाप्त हो जाती है। आत्मा नित्य नहीं है। उसका पुनर्जन्म नहीं होता इसलिए जीवनकाल में सुख की साधना करना ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए।

समझा जा सकता है भारतीय संस्कृति वेदों पर आधारित होने के बावजूद उसमें कितने मतभेद पैदा हो चुके थे। यह सिलसिला आगे भी जारी रहा। इसके बाद जैन और बौद्ध धर्म अस्तित्व में आए। 

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)