मनुष्य का जन्म और समाज की रचना

ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।  

अगर हम सब धर्म का पालन करते हैं तो पूछा जाएगा धर्म कौनसा? हम यही जवाब दे सकते हैं कि हम हिंदू हैं। मान लेते हैं कि अन्य तमाम धर्मों की मौजूदगी के बीच स्वयं को परिभाषित करने के लिए हिंदू धर्म कहना ठीक है तो यह अन्य धर्मों के पहले से चला आ रहा है, यह मानना पड़ेगा। धर्म के आधार पर बहुत विवाद पैदा होते हैं और लड़ाई-झगड़े होते हैं। हिंदू-मुसलमान के दंगे इस देश में बहुत होते रहे हैं। मुसलमानों का धर्म इस्लाम नया है। सिर्फ डेढ़ हजार साल पुराना। उन्होंने भारत में आकर यहां के लोगों को मारना शुरू किया और शासन करने लगे। उनके आने से पहले तो कभी हिंदू शब्द प्रचलित नहीं हुआ। मुसलमानों के आने के बाद से ही हिंदू शब्द प्रचलित है।

दरअसल हुआ यह था कि धरती पर किसी भी तरह मनुष्य का जन्म हो गया। उसके पास बुद्धि है, विश्लेषण क्षमता है, सीखने की क्षमता है, दूसरों को सिखाने की क्षमता है, बोलने की क्षमता है, अभिव्यक्ति की क्षमता है, बुद्धि है और उसके प्रयोग की क्षमता है। और भी क्षमताएं हैं, जो अन्य प्राणियों के पास नहीं है। अन्य प्राणियों की क्षमताएं अलग हैं। मनुष्य अपनी बुद्धि के प्रयोग से अन्य प्राणियों की क्षमताओं का भी अपने हित में उपयोग कर सकता है। लेकिन यह सब अकस्मात नहीं होता। सीखना पड़ता है।

सोचने की बात है, मनुष्य का इस धरती पर पहला दिन कैसा होता है। वह करीब डेढ़-दो किलो वजनी मांसपिंड के रूप में एक स्त्री की योनि से नीचे टपक जाता है। उस मांसपिंड का विकास स्त्री के शरीर में होता है। जहां होता है, उसे गर्भ कहते हैं। गर्भ में अंडे बनते रहते हैं। हर अट्ठाइस दिन में वे अंडे योनि से दुर्गंधयुक्त द्रव के रूप में बाहर निकलते हैं। किसी पुरुष के साथ वयस्क स्त्री का संभोग होने के बाद मनुष्य के वीर्य में उपस्थित शुक्राणुओं में से कोई भाग्यशाली एक गर्भ में अंडे तक पहुंचकर उससे चिपक जाता है और नया मनुष्य के बनने की प्रक्रिया शुरू होती है।

स्त्री प्रत्येक मनुष्य को जन्म देती है। वह इस विषय में क्या सोचती है, आज तक कोई पुरुष नहीं जान पाया। स्त्री काम वासना जाग्रत होने पर सिर्फ संकेत और व्यवहार से अभिव्यक्त करती है, लेकिन अधिकांश पुरुष इसे समझ नहीं पाते। यह स्त्रियों की सबसे बड़ी समस्या है। स्त्री का पुरुष को संभोग के लिए प्रेरित करना प्यार, मोहब्बत के नाम से जाना जाता है। इसका प्रतीकात्मक वर्णन बहुत हुआ है। साहित्य का ढेर है। लेकिन साफ शब्दों में बात करने के उदाहरण बहुत कम मिलते हैं।

मनुष्य को जन्म के बाद आधि-व्याधि से बचते हुए वयस्क होना पड़ता है। वह बच्चे से बड़ा होता है। उसके शरीर का विकास पचास-पिचत्तर किलो तक पहुंच जाता है। और ऊंचाई पांच से साढ़ेपांच-साढ़े छह फीट तक। पुरुष का भी, स्त्री का भी। पुरुष का शरीर अलग तरीके से विकसित होता है। स्त्री का शरीर अलग तरह से। दोनों के मस्तिष्क का पता नहीं लेकिन शरीर की कार्यप्रणाली अलग-अलग होती है। भोजन आदि समान होता है, लेकिन भोजन ग्रहण करने के बाद बाकी व्यवस्थाएं बदल जाती है। समाज की पूरी व्यवस्था पुरुष के पास होने से वह स्त्री को कभी भी अच्छी तरह से नहीं समझ पाता। भारतीय विवाह परंपरा में लंबे समय तक के लिए विवाह की व्यवस्था इसी लिए है। विवाह के बाद दोनों एक दूसरे को समझते हैं। दोनों की पूरी जिंदगी निकल जाती है, फिर भी वे एक दूसरे को कभी नहीं समझ पाते। हर दिन एक नया सवाल जीवन की गति बनाए रखता है। 

समाज व्यवस्था पर पूरी तरह पुरुषों का नियंत्रण है। जितने भी अवतार और पैगंबर, जिनके नाम पर कट्टरता फैलाई जाती है, वे भी पुरुष थे। सभी ने जितना भी ज्ञान बांटा है, उसमें स्त्री को विशेष वस्तु की तरह माना है। स्त्रियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भयानक रूप से सीमित है। उनकी देह का इस्तेमाल बहुत है, लेकिन उनकी बुद्धि को मान्यता नहीं है। कई महिलाओं की सिर्फ देह का व्यापार अनाप-शनाप तरीके से बढ़ चुका है। वह तमाम विज्ञापनों में इस्तेमाल हो रही है। पुरुषों की काम वासना पूरी करने के लिए स्त्री देह की मंडियां हैं, बाजार सजे हैं। इसका बहुत बड़ा कारोबार चल रहा है।

यह सब अश्लीलता फैलाने के लिए नहीं, यह स्पष्ट करने के लिए लिखा जा रहा है कि पता नहीं, राजनीतिक लाभ के लिए कट्टरता फैलाने वाले लोग मनुष्य के जन्म और विकास के बारे में बुनियादी तथ्य जानते हैं या नहीं? यह सब हो रहा है, प्रत्यक्ष है, छिपी हुई बात नहीं है और हम सब हिंदू हैं, देख रहे हैं। अन्य धर्म में भी नहीं जा सकते क्योंकि यहीं के हैं तो हिंदू ही हैं और हिंदू ही रहेंगे। और हिंदू अगर अन्य धर्मों के साथ मिल-जुलकर रहना सीख गए हैं तो हिंदुत्व के नाम पर उनकी राजनीतिक गोलबंदी क्यों? यही बात दुखी करने वाली है। क्या द्वेष पालने के लिए समाज की नारकीय बुराइयां कम पड़ रही हैं, जिन्हें सभी मनुष्य मिलकर पैदा किए हुए हैं? 

 (लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)