नहीं बनाया
ईश्वर ने
कोई धर्म
नहीं बनाया
ईश्वर ने
और
न ही बनायी
कोई भी
धार्मिक किताब
ईश्वर
नहीं है रचयिता
किसी भी
धर्म या
उससे जुड़ी
किताब का
कहते तो
सभी धर्म यही हैं
कि
मानवता ही है
सबसे बड़ा
धर्म
लेकिन
मनुष्यों की सर्वाधिक
लाशें
धर्म के नाम पर ही
गिरी हैं
इसीलिये
कहा गया है इसे
नशा
वो भी ऐसा जिसमें
लड़ता है
नशेड़ी ही नशेड़ी के
ख़िलाफ़
और सोचता है
कि
वह राह पर है
धर्म की
मिटा रहा है
अधर्म को
रक्षा कर रहा है
अपने
ईश्वर की
भूल जाता है मनुष्य
कितनी सुविधापूर्वक
कि
उसी ने बनाया है
ईश्वर को भी
होती है कोई-कोई
रचना ऐसी भी
जब
रचना बड़ी हो जाती है
और
नचाने लगती है
अपने ही
रचयिता को
क्या कभी
हो पायेगा तय
कि
ईश्वर और धर्म
का बनाना
मनुष्य की
हार है या जीत ?
©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)


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