सन 1920 के दशक में जो कारें और अन्य वाहन निर्मित होते थे थे उनमें एक बड़ी समस्या होती थी जिसे इंजिन नोकिंग कहा जाता था जब ईंधन के अप्रभावी ज्वलन से इंजिन में कट कट की आवाज आने और गति में विघ्न आने लगता था। इस तकलीफ का निदान इंजीनियर्स ने इंजिन के तेल में थोड़ा पारा यानि लेड मिला कर निकाला। यह सब 1920 से 1973 तक चलता रहा।
वाहनों
के पारा युक्त धुएं का अमेरिका की राष्ट्रीय बुद्धिमता पर बहुत बड़ा नकारात्मक असर
पड़ा यह बात कुछ ताजा अध्ययनों से पता चली है। अमेरिका में लंबे समय से रहनेवाले लोग
मानते हैं वहां के उस दौर में पल बढ़ रहे लोग कुछ सामान्य बुद्धि के कार्यों में बड़ी
नादानी या बचपना दिखाते रहे हैं। शोध से पता चला है कि पारा युक्त धुएं ने अमेरिका
के 17 करोड़ लोगों को प्रभावित किया। इस धुएं ने इस देश के लोगों के 82 करोड़ 40 लाख
आई क्यू प्वाइंट ( बुद्धिमता अंक ) नष्ट कर दिए। बचपन से युवावस्था तक हर व्यक्ति के
2.6 आई क्यू प्वाइंट नष्ट हो गए थे। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह पारा युक्त
धुंआ नहीं होता तो अमेरिका शायद एक दूसरी तरह का राष्ट्र होता। भारत में तो ऐसे वाहन
2000 के बाद तक भी चलते रहे हैं।
पारा
एक भारी तत्व है जिसका मतलब होता है कि इसका अणु वजन अधिक होता है और घनत्व ( डेंसिटी
) पानी की तुलना में कम से कम पांच गुना ज्यादा होती है। पारा एक बड़े नुकसान करने
वाला जहर होता है। इसको यदि किसी माध्यम से सेवन किया जाए या इसकी भाप को सांस द्वारा
लिया जाए तो कई हानिकारक परिणाम निकल सकते हैं। पारा हृदय, हड्डियां, गुर्दे, दांत,
आंत, प्रजनन अंग, तंत्रिका तंत्र, मस्तिष्क और रोग प्रतिरोधक तंत्र को नुकसान पहुंचाता
है। इस तरह से पारा हमारे शरीर के लिए व्यापक स्तर पर नुकसानदेह होता है। पारा पहले
घरेलू और व्यवसायिक रंगों, पानी के पाइप और इंजिन ऑयल में उपयोग किया जाता था। इसके
दुष्प्रभावों को देखते हुए 1973 में इसके उपयोग पर पूरे विश्व में रोक लग गई। लेकिन
आज भी दूषित पानी, दूषित मिट्टी, घरों की धूल, बगीचे की मिट्टी आदि में अति निम्न मात्रा
में पारा मिल सकता है। सिगरेट के धुएं में अति सूक्ष्म पारा हो सकता है। कुछ देशी और
पारंपरिक दवाओं दवाओं में इसका आज भी उपयोग हो सकता है क्योंकि अभी भी ज्यादातर लोग
पारे के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक नहीं हैं। आज भी लोग अनाज में पारे की गोलियां
कपड़े में बांध कर रखते है। ये गोलियां हालांकि सीधे तौर पर नुकसानदेह नहीं होती परंतु
दुर्घटना की संभावना तो बनी ही रहती है।


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