मालूम नहीं किस मंजिल पर, सांसों का खजाना लूट जाए।
क्या सोच के तुम
हिस्सा मांगो, क्या सोच के मैं इकरार करूं।।
गजलकार कैसर ने दो पंक्तियों में जीवन को पूर्णतया बांध दिया है। इतना क्षण भंगुर जीवन
लेकर हम लोग किसी अंजान भविष्य के बारे में कितना चिंतित रहते हैं। हम पद, धन,
मान सम्मान, पिता की संपति , प्रेम संबंधों आदि सभी को लेकर करीब करीब पूरे जीवन संघर्षरत
रहते हैं। भगवान को सर्वशक्तिमान कहते हैं पर खुद उसकी रक्षा करने के दावे करते हुए
मरते मारते रहते हैं। स्त्री को देवी मानते हैं, उसे परदे में रखते हैं पर पहला मौका
मिलते ही उसे परेशान करते हैं, छेड़ते हैं। राष्ट्रीय एकता की बातें करते हैं पर अपने
ही सुनियोजित षड्यंत्रों द्वारा देश समाज को विभक्त करते रहते हैं। इन कृत्यों से हमारे
जीवन में सकून कहां से आएगा ? कब समय निकालते हैं कि जीवन की छोटी छोटी सी बातों
का आनंद लिया जाए ? भाई बहन जमीनों के बंटवारे को लेकर और पति पत्नी घर में वर्चस्व
को लेकर संघर्षशील रहते हैं। अदालतों में कोई सत्तर फीसदी मामले तो अपनों के बीच में
ही हैं। हम भूल से गए हैं कि आनंद के पल ही जिंदगी है बाकी सब बस सांस लेने का क्रम
मात्र है।
इस तरह का माहौल इसलिए पैदा हुआ क्योंकि भौतिक प्रगति के दौर में आपसी बौद्धिक संवाद
समाप्त सा हो गया। कुछ यूं सा हुआ कि
आगे
बढ़ने की चाहत में, रिश्ते नाते सब छूट गए
तन को जितना गढ़ना
चाहा, मन से उतना ही टूट गए।।
दो
व्यक्तियों के बीच यदि संवाद होता रहे तो मानसिक द्वंद की गांठें खुलने लगती हैं अन्यथा
जीवन में नकारात्मकता का ढेर लग जाता है, जीवन अवसाद और बैचेनी से भर जाता है। लगने
लगता है कि सारी तथाकथित सफलताओं को पाने के बावजूद जीवन में सब रीता रह गया। अपने
मीठे संवाद के कारण कोयल प्यारी लगती है पर हमारे शहरों का और मन के अंदर का कोलाहल
कोयल के गीत संगीत को लील गया। हमारी युवा पीढ़ी से हमने कोयल छीन ली। उनमें से अधिकांश
को कोयल के अस्तित्व तक से अनभिज्ञ हैं।
ऐसी स्थिति में यदि आप स्वयम को किसी विपरीत स्थिति में पाते हैं, बैचेनी और अवसाद
से घिर जाते हैं तो समय रहते ही व्यवहार बोध मन चिकित्सा का सहारा ले सकते हैं जिसे
सामान्यतया कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी कहा जाता है। एक से एक व्यक्ति के संवाद से नई
वैचारिक खिड़कियां खुलती हैं क्योंकि आपका साइकोलॉजिस्ट एक तटस्थ एवम् पूर्वाग्रहमुक्त
व्यक्ति है। एक अनुभवी साइकोलॉजिस्ट आपके संवाद के स्तर को उठाता है जिसके कारण आप
खुद अपनी समस्या को नए कोण से देखने लगते हैं और उसके साथ कुछ सत्र लेने के बाद स्वयं
ही समाधान तक पहुंच जाते हैं।
भारत में साइकोलॉजी बहुत विकसित नहीं हो पाई क्योंकि हमारे समाज ने एक से एक के संवाद
को सदा ही संदेह की दृष्टि से देखा है। दूसरी बात ये रही कि लोग खुद से ज्यादा समझदार
किसी अन्य को मानते ही नहीं हैं तो फिर संवाद कैसे होगा ? इस प्रवृति के चलते भारत
विश्व के अवसाद और बैचेनी ग्रस्त राष्ट्रों की प्रथम कतार में है। हमारे देश में जो
गिने चुने साइकोलॉजिस्ट हैं भी तो वे सिर्फ किताबी ज्ञान तक ही सीमित हैं। एक बेहतरीन
मनोचिकित्सक के लिए आवश्यक है कि वह एक दार्शनिक और समाजशास्त्री भी हो, राजनीति, व्यवसाय,
उद्धम आदि से भी कुछ जुड़ा हुआ हो। यानि कि वह एक बहु आयामी व्यक्तित्व रखता हो। अब
सवाल उठता है कि क्या हम इसने ज्ञानी व्यक्ति के जीवनयापन की आवश्यकताओं की पूर्ति
जितनी फीस देना चाहेंगे ? हम तो चाहते हैं कि हमारी सेवाओं के लिए हर कोई मानवीय आधार
पर ही तत्पर रहे और हमारी जरूरतों की आपूर्ति निशुल्क करे। यह एक बड़ा कारण हैं अधिकांश
लोग विरोधभासों भरा जीवन जीते रहेंगे ..... आत्म मोह और अवसाद में आकंठ डूबे
हुए।


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