आज कल हम सुन रहे हैं, पढ़ रहें हैं कि कोई युवा खिलाड़ी, युवा संगीतकार, अच्छा भला दिखनेवाला गायक और कोई दूर या पास का परिचित यकायक दुनिया से विदाई ले लेता है। ये सब हृदयविदारक घटनाएं इतनी ज्यादा होने लगी हैं कि हर व्यक्ति अपने आप को भयग्रस्त पाता है। कितने ही स्वस्थ दिखाने वाले लोग अचानक हृदयरोग से पीड़ित पाए जाते हैं। किसी को स्टेंट लगाना पड़ रहा है तो कोई बायपास करवा रहा है। अब सवाल उठता है कि यह सब क्यों हो रहा है और इसके संभावित कारण क्या हैं। इसके अलावा ऐसी स्थिति से बचने के लिए क्या किया जा सकता है?

     मैंने अपने चालीस साल के चिकित्सकीय अनुभव में इतनी ज्यादा संख्या में इतने युवा लोगों में हार्ट अटैक नहीं देखे जितना पिछले एक साल में देखे हैं। इसका एक कारण तो सामाजिक मीडिया द्वारा ज्यादा सूचना मिलना हो सकता है और दूसरा कोविड काल में आलस्य भरी जीवन शैली। कोविड टीका भी मेरी समझ में शक के घेरे से बाहर नहीं है और इस पर विस्तृत अध्ययन होना चाहिए। इसके अलावा हमे दीर्घकालीन कोविड के बारे में भी जागरूक रहना होगा।

     अब सवाल उठता है कि क्या सावधानियां बरती जाएं कि हम किसी ऐसे हादसे का शिकार नहीं बनें। मेरी राय में इसका सबसे बेहतर उपाय है घूमना। रोजाना करीब नब्बे मिनट किसी न किसी रूप में घूमो। बाग में जाओ, घर की सीढ़ियां चढ़ो, कोई खेल खेलो, बाजार पैदल जाओ, कुछ भी करो पर चलो। अपने छोटे मोटे कार्य अपने हाथ पैरों से करो। सक्रिय रहो। एक बड़ा अध्ययन बताता है कि यदि अमेरिका का हर व्यक्ति प्रतिदिन दस मिनट अतिरिक्त पैदल चले तो वहां प्रति वर्ष करीब एक लाख दस हजार मौतें कम हो जाएंगी। भारत में तो यह आंकड़ा कई लाख तक जा सकता है।

     चलने फिरने से कई तरह के कैंसर होने की संभावनाएं कम होती हैं और वजन कम होने के फलस्वरूप मोटापा, मधुमेह तथा उच्च रक्तचाप को नियंत्रित रखने में बड़ी सहायता मिलती है। यदि आप प्राकृतिक स्थानों के आस पास घूमते हैं तो डिप्रेशन कम हो जाता है, उमंग बढ़ जाती है, आप की कार्यकुशलता के साथ साथ क्रियाशीलता में भी उत्थान आता है। इसलिए बेहतर होगा यदि आप किसी हरे भरे स्थान के आस पास घूमें और अपने घर के आसपास प्रकृति का श्रृजन करें।

     आखिर में आपका शरीर तभी स्वस्थ रहेगा जब मन प्रसन्न होगा। जिंदगी में ना करना भी सीखिए। यदि शरीर थक रहा हो, कुछ गड़बड़ लग रहा हो तो आराम कीजिए, चिकित्सक की सलाह लीजिए, निदान तक पहुंचिए। थका गायक के के यदि ना करने का साहस करता तो संभव है कि बात निदान व उपचार तक पहुंचती। इसलिए हमेशा अपने शरीर की आवाज को सुनिए। हिंसा, नफरत, द्वेष को दूर रखिए क्योंकि ऐसा व्यक्ति शतायु होता नजर नहीं आया है। उस मंजिल तक तो भोले भाले राग द्वेष मुक्त लोग ही पहुंचते दिखे हैं। प्रतिद्वंदिता की विजय और धन दोनों ही अहंकार की तुष्टि तो कर सकते हैं पर जीवन का एक सांस नहीं खरीद सकते हैं। संपन्न बनने के लिए श्रम जरूर कीजिए पर ईमान मत बेचिए। जीवन है तो कई विकल्प खुले हैं वरना चाहे कोई कुबेर बना घूमता फिरे या देश का सिरमौर, यदि निकली सांस वापस नहीं आए तो सबकुछ पटाक्षेप।