मनुष्य की जीवनशैली की वजह से धरती पर मौसम में बड़े बड़े परिवर्तन हो रहे हैं। एक तो धरती का औसत तापमान बढ़ रहा है और दूसरे तापमान में तीव्र एवम् बार बार ऊंच नीच होती देखी जा रही है। कहीं एक दो सदी की सबसे ज्यादा बाढ़ आ रही है तो कहीं अत्यधिक उष्णता से जंगलों में आग लग रही है और कहीं कहीं अभूतपूर्व बर्फबारी हो रही है। इस तरह के मौसमी परिवर्तनों का मानव, जंगली जीव तथा पेड़ पौधों के जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। दुर्भाग्य से यह प्रभाव नकारात्मक पड़ता नजर आ रहा है जहां संक्रामक रोगों के तेजी से बढ़ने की संभावनाओं से नकारा नहीं जा सकता है।

     दक्षिण अफ्रीका में हुए एक अध्ययन के अनुसार दिन में बार बार तापमान परिवर्तन होने से मलेरिया के कीटाणुओं की संक्रमणता बढ़ जाती है। डबलिन की ट्रिनिटी कॉलेज द्वारा किए गए एक शोध में पाया गया कि तापमान का बदलाव कई बीमारियों के व्यवहार में अनपेक्षित बदलाव व परिणाम ला सकता है। चूंकि कीटाणु कोशिकाएं मनुष्य या जानवर की कोशिकाओं से बहुत छोटी होती हैं इसलिए उनकी चयापचय दर ( मेटाबोलिक रेट ) कहीं ज्यादा होती है। इस वजह से ये कोशिकाएं उष्ण तापमान को बेहतर बर्दास्त कर सकती हैं। इस कारण से वे मनुष्य के शरीर पर अधिक वेग से हमला कर सकती हैं।

     तापमान बढ़ने से होने वाली गर्मी की वजह से शरीर को अंदरूनी तौर पर एक विशिष्ठ स्थिति में बनाए रखना पड़ता है ताकि उसकी आंतरिक व्यवस्थाएं यथावत बनी रहें। ऐसा करने में काफी ऊर्जा ह्यास होती है। इसके फलस्वरूप, रोग प्रतिरोध कार्यों के लिए ऊर्जा कम पड़ सकती है जिससे शरीर की सुरक्षा प्रणाली कमजोर हो जाती है और रोग तेजी से फैलता है, ज्यादा हानिकारक हो जाता है। धरती के वातावरण में तेजी से परिवर्तित तापमान के कारण कोई भी रोग किसी भी देश या स्थान पर कभी भी हो सकता है। ऐसे में चिकित्सकों द्वारा उसे पहचानने में देरी हो सकती है। उदाहरण के तौर पर अफ्रीका का पीला बुखार यदि भारत में आ जाए तो यहां के चिकित्सक उसे नहीं पहचान पायेंगे क्योंकि अभी तक ये बीमारी भारत में होती ही नहीं है।

     हमे सदा ध्यान रखना होगा कि मानव का स्वास्थ्य जानवरों, जंगलों और धरती सब से जुड़ा हुआ होता है। हमारे पास जितने सीमित विकल्प हैं उन से हमें हमारे वातावरण को बचाने का प्रयास करना चाहिए। युवा ऊर्जा को हुड़दंगबाजी से हटा कर वृक्षारोपण जैसे कार्यों की तरफ आकर्षित करना चाहिए।