जयपुर ब्यूरो रिपोर्ट।
राजस्थान के गृह विभाग ने चिकित्सकों की सुरक्षा मे एसओपी जारी की है। गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव अभय कुमार ने आदेश जारी कर बताया कि वर्तमान समय में आमजन मे अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता में वृद्धि हुई है। परन्तु कई बार इंटरनेट के माध्यम से आधी-अधूरी सूचना प्राप्त कर रोगी के परिजन चिकित्सक / चिकित्साकर्मियों के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज करवा देते है। ऐसी स्थिति में चिकित्सक / चिकित्साकर्मियों को मानसिक रूप से उत्पीड़ित होना पड़ता है, जिससे उनकी कार्यक्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। उच्चतम न्यायालय ने उक्त विषय पर विभिन्न निर्णयों में विधिक सिद्धान्त प्रतिपादित किये हैं।
यह रहेगी एसओपी
किसी चिकित्सक / चिकित्साकर्मी राजस्थान चिकित्सा परिचर्या सेवाकर्मी और चिकित्सा परिचर्या सेवा संस्था (हिंसा और सम्पत्ति के नुकसान का निवारण) अधिनियम, 2008 मे यथा परिभाषित) के कार्य निष्पादन के दौरान की गई चिकित्सकीय उपेक्षा के अभियोग की सूचना / परिवाद पुलिस थाने के प्रभारी को प्राप्त होने पर वह सूचना / परिवाद को रोजनामचे में अंकित करेगा और यदि सूचना / परिवाद चिकित्सकीय उपेक्षा के कारण मृत्यु से सम्बन्धित है, तो दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 174 के तहत मामला दर्ज किया जायेगा। ऐसी स्थिति में पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी आवश्यक रूप से करवाई जावे।थानाधिकारी के लिए यह आज्ञापक है कि वह चिकित्सकीय उपेक्षा की शिकायत पर प्राथमिक जाँच करें एवं जाँच के दौरान वह अभियोग के सम्बन्ध में स्वतंत्र व निष्पक्ष राय यथास्थिति चिकित्सक / चिकित्सक मंडल से प्राप्त करेगा। थानाधिकारी द्वारा प्राचार्य, चिकित्सा महाविद्यालय / मुख्य चिकित्सा अधिकारी को राय प्राप्त करने हेतु प्रार्थना किये जाने पर उनका यह दायित्व होगा कि वह यथाशीघ्र अधिकतम तीन दिवस में राय हेतु यथास्थिति चिकित्सक को नामित / चिकित्सक मण्डल का गठन करेगा। किसी व्यक्ति की चिकित्सकीय उपेक्षा से मृत्यु या घोर उपहति होने की दशा में चिकित्सक मंडल का गठन अनिवार्य होगा चिकित्सक मण्डल में प्रश्नगत अभियोग से सम्बन्धित विषय के विशेषज्ञ को अवश्य सम्मलित किया जाए। चिकित्सक / चिकित्सक मंडल का यह दायित्व होगा कि यदि प्रकरण चिकित्सकीय उपेक्षा से सम्बन्धित है तो वह बिना किसी भेदभाव के उपेक्षा साधारण है या घोर इस सम्बन्ध में स्वतंत्र व निष्पक्ष राय उन्हें नामित किए जाने के पन्द्रह दिवस की अवधि में प्रदान करेंगे। समयावधि में राय प्राप्त नहीं होने पर या समयावधि में राय दिए जाने में किसी भी कारण से असमर्थता होने पर समय में 15 दिवस की अभिवृद्धि प्राचार्य, चिकित्सा महाविद्यालय / मुख्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा कारण अभिलिखित करते हुए की जा सकती है। समयावधि में अभिवृद्धि की सूचना सम्बन्धित पुलिस अधीक्षक को प्रेषित करते हुए यह तथ्य राज्य सरकार के ध्यान में भी लाया जाएगा। घोर चिकित्सीय उपेक्षा की राय प्राप्त होने पर ही थानाधिकारी द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की जाएगी। अनुसंधान के उपरान्त न्यायालय में आरोप-पत्र पेश किये जाने से पूर्व जो 197 दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की श्रेणी में आते है, उन समस्त प्रकरणों से अभियोजन स्वीकृति प्राप्त की जायेगी। किसी चिकित्सक / चिकित्साकर्मी को घोर चिकित्सकीय उपेक्षा के प्रकरण में बिना पुलिस अधीक्षक / पुलिस उपायुक्त की आज्ञा के गिरफ्तार नहीं किया जाये। चिकित्सक, चिकित्साकर्मी को गिरफ्तार करने के आदेश तब ही दिये जायेंगे जब थानाधिकारी की लिखित राय में ऐसा चिकित्सक / चिकित्साकर्मी अनुसंधान में सहयोग नहीं कर रहा है या साक्ष्य एकत्रित करने के लिए उसकी आवश्यकता है या अभियोजन से बचने के लिए वह अपने आप को छिपा रहा है। राजस्थान चिकित्सा परिचर्या सेवाकर्मी और चिकित्सा परिचर्या सेवा संस्था (हिंसा और सम्पत्ति के नुकसान का निवारण) अधिनियम, 2008 की कडाई से पालना की जाए।चिकित्सक / चिकित्साकर्मी के परिवाद / सूचना पर शीघ्र कार्यवाही की जाए। आवश्यकता होने पर उनकी व उनकी सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए विधिनुरूप कार्यवाही शीघ्रता से की जाये। चिकित्सक रोगी के उपचार का व्याख्यात्मक विवरण तैयार करेंगे।चिकित्सक/ चिकित्साकर्मियों के कार्य की प्रकृति व जनसाधारण के जीवन की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे किसी भी अप्रिय घटना के घटित होने पर या अपनी किसी मांग को मनवाने के लिए अपने कार्य का बहिष्कार नहीं करेगें तथा विधि के अनुरूप अपनी बात / मांग राज्य सरकार के समक्ष रखेगें।

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