दौसा। 

 दंगल का नाम सुनते ही सामने कुश्ती की तस्वीर आ जाती है। लेकिन, ऐसा नहीं है। राजस्थान के दौसा में एक दंगल गानों का खेला जाता है। गानों के इस दंगल की खास बात यह है कि इन्हें व्यंग के रूप में गाया जाता है। इन गानों में केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकार तक पर निशाना साधा जाता है।

दरअसल, दौसा जिले के लालसोट में यह हेला ख्याल दंगल होता है। गणगौर के बाद इसकी शुरुआत होती है। इस बार 272वां हेला ख्याल संगीत दंगल का आयोजन किया गया था। इसकी एक और खास बात यह है कि यह लगातार 36 घंटे तक चलता है।

इस बार के दंगल में सबसे चर्चित विषय रहा रीट परीक्षा, भ्रष्टाचार, महंगाई और रूस-यूक्रेन विवाद। रीट परीक्षा पर दंगलबाजों ने व्यंग कसते हुए कहा कि …रीट परीक्षा में घपला कर डाला काला धंधा, लाल किरोड़ी ने जयपुर जाकर लगा दिए इन सबके फंदा, डोटासरा और जारौली ने देख लिया है अपना फंडा, आस लगाकर दे दिया..

महंगाई पर भी जमकर चुटकी ली और गाना गया….क्या रे गजब से शासन आया, जनता ने दुख पाया कमर तोड़ महंगाई ने, जनता के दिल दिल आया है कांदा रोटी मुश्किल हुई, कांदा ने रंग दिखाया है 30 का, 1 किलो बाजार भाव बतलाया है।

35 घंटे पहले मां भवानी की पूजा के साथ शुरुआत
इसकी शुरुआत 36 घंटे पहले भवानी पूजन के साथ हुई। मां भवानी से देश में बिगड़े हालातों को ठीक करने, विश्व में शांति, देश को आतंकवाद व भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के साथ अन्य मुद्दों पर ख्याल गायकी के माध्यम से प्रार्थना की गई। लक्ष्मीनाथ मंडल के गायक कलाकारों ने श्याम ग्रामीण के सानिध्य में भवानी पूजते हुए अपनी ख्याल रचना में कहा, अरजी म्हारी सुण ली ज्यो, बुद्धि नेताओं को दी ज्यो, सेवा भक्ति भर दी ज्यो.., शक्ति भर दी ज्यो, देश प्रेम की रंग में रंग दी ज्यो...। वहीं, मंडली ने देश में संपन्नता के लिए प्रार्थना करते हुए कहा कि दे दो मौहे ये वरदान, भर दो खेत-खलिहान, अरे घर-आंगन धान से भर दो, जन जीवन मंगलमय कर दो, हे मेरी मैया...।

ऐसे हुई इस दंगल की शुरुआत
272 साल पहले इस दंगल की शुरुआत की गई थी। मान्यता है कि लालसोट क्षेत्र के अधिकांश लोग व्यापार के लिए दूसरे राज्य में रहते थे, जो गणगौर के अवसर पर अपने पैतृक गांव आते थे। मनोरंजन के लिए हेला ख्याल दंगल की शुरुआत की। तभी से यह दंगल गणगौर के बाद होने लगा। पहले दंगल का आयोजन झरंडे चौक पर हुआ करता था। बाद में फैलती ख्याति व श्रोताओं की बढ़ती संख्या के कारण 1961 से यह दंगल लालसोट के जवाहर गंज सर्किल पर होने लगा।

40 से 50 गायक कलाकारों की मंडली लेती है भाग
पहले इस दंगल में तीन बास (खोहरापाडा, जोशीपाडा, तंबाकूपाडा) व 4 बास (उपरलापाडा, लांबापाडा, गुर्जर घाटा व पुरोहितपाडा) की गायक मंडलियां भाग लेती थी। लेकिन, फैलती ख्याति व बढ़ते स्वरूप में कारण आज इनकी संख्या करीब 20 हो गई है। प्रत्येक गायक दल में 40 से 50 गायक कलाकार भाग लेते है। खास बात यह है कि इसमें पुराने म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट का उपयोग होता है। इनमें बाजा, ढप, घेरे, मंजीरा, ढोलक, खरताल, पूंगी, ढोल, चंड चिमटा सहित अनेक पुराने म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट का उपयोग होता है। दंगल की परंपरा को जीवित रखने में लोक कवि हजारीलाल ग्रामीण का इसमें अहम योगदान रहा है।

हाड़ौती व ढूंढाडी संस्कृति का अनूठा संगम
इस हेला ख्याल दंगल को सुनने के लिए मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, गुजरात, आंध्रप्रदेश व कर्नाटक सहित देश के विभिन्न प्रांतों में बसे प्रवासी राजस्थानी यहां पहुंचते हैं। रजवाड़ा काल में यह हेला ख्याल संगीत दंगल तेल की मशालों के बीच होता था। इसके लिए तत्कालीन रजवाड़ों द्वारा तेल उपलब्ध कराया जाता था। मशालची तैनात रहते थे। मीठे तेल की जलती मशालों के बीच इस दंगल में लोक गायक अपनी काव्य रचना की बेहतरीन प्रस्तुति देते थे। इस दंगल में करीब 30 से 40 हजार श्रोता भाग लेते हैं।