आमदार निवास में पड़ाव
ऋषिकेश राजोरिया
एमएलए होस्टल में रहते हुए जिंदगी काफी बदल गई थी। रोजाना लोकल ट्रेन में नहीं बैठना पड़ता था। कुलाबा के भगतसिंह मार्ग पर मेजेस्टिक एमएलए होस्टल था। पहले अंग्रेजों ने यहां एक बड़ा होटल बनाया था। उसकी विशाल इमारत अब मेजेस्टिक आमदार निवास कहलाती थी। एमएलए होस्टल के सामने बहुत बड़ा चौराहा था। बाईं तरफ का रास्ता नरीमन पाइंट की तरफ, दाईं तरफ गेट वे ऑफ इंडिया की तरफ जाने वाली दो सड़कें। एक वीटी स्टेशन की तरफ, दूसरी रिजर्व बैंक के सामने से। चौराहे पर नरीमन पाइंट के सामने की दिशा में पुलिस मुख्यालय की विशाल इमारत। पास में रीगल टाकीज, मोंडेगर रेस्तरां। हम पहली मंजिल से तल मंजिल पर जिस दरवाजे से बाहर निकलते थे, उसके सामने की सड़क का नाम था भगतसिंह मार्ग। यहां से मुंबई का कुलाबा इलाका शुरू होता था।
मेजेस्टिक एमएलए होस्टल से नरीमन पॉइंट करीब एक किलोमीटर था। इसलिए पैदल ही कार्यालय चला जाता था। मंत्रालय के सामने से गुजरते हुए सीधे एक्सप्रेस टॉवर। भरत पंडित और राजेन्द्र जडेजा ने बड़े भाई की तरह सम्मान दिया। हम तीनों वहां 2 कमरों में एक परिवार की तरह रहते थे। बाहर के कमरे में मैं रहता था। भीतर के कमरे में भरत और राजेन्द्र। भरत प्रतिभाशाली था और अच्छी नौकरी की तलाश कर रहा था। राजेन्द्र गुजरात सरकार के उपक्रम गुर्जरी का कर्मचारी था, जिसका शोरूम चर्चगेट के पास ही था। गुर्जरी पर गुजराती हस्तशिल्प और कपड़ों की बिक्री होती थी।
जनसत्ता में अच्छे अनुभवी पत्रकारों के चले जाने के बाद राहुल देव ने अपने स्तर पर भी नियुक्तियां शुरू कर दी थी। उनकी अगुवाई में समाचार डेस्क संभालने की क्षमता रखने वाले पत्रकार ज्यादा नहीं बचे। खास तौर से पहला आखिरी पेज लगवाने की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण थी। एक कुशल उप संपादक की जरूरत सिटी डेस्क पर रहती थी। बाकी तमाम रिपोर्टर थे। गणेश झा के जाने के बाद पहले पेज की जिम्मेदारी गोडबोले पर आ गई थी। सिटी डेस्क पंकज संभालते थे। पंकज के जाने के बाद गोडबोले सिटी डेस्क संभालने लगे और पहला पेज मेरे सुपुर्द हो गया।
खेल पेज की जिम्मेदारी रविराज प्रणामी संभालते थे। कश्यप गजब व्यापार पेज के प्रभारी थे। जो लोग काम कर रहे थे, उनमें प्रमुख थे धीरेन्द्र अस्थाना, ओम प्रकाश सिंह, संजय निरुपम, दीपक पाचपोर, अनिल सिन्हा, भृगुनाथ चौहान, द्विजेन्द्र तिवारी, सरोज कुमार मिश्रा, श्रीनारायण तिवारी, राकेश दुबे, देवेन्द्र राठौड़, प्राण धाबर्डे, शशिकला राठी, भारती पावस्कर, विद्योत्तमा वत्स, रेखा देशपांडे, चंदर मिश्रा, अनंत जोशी, आलोक दुबे, इंद्रकुमार जैन, बसंत मौर्य और अन्य। इनमें से एक दो को छोड़कर कोई भी दैनिक अखबार के संपादकीय विभाग में काम करने का अनुभवी नहीं था। जनसत्ता उनके जीवन में पहला बड़ा दैनिक अखबार था, जिसमें वे काम कर रहे थे।
धीरेन्द्र अस्थाना साहित्य से जुड़े थे और पहले दिल्ली में पत्रिकाओं में काम कर चुके थे। ओम प्रकाश सिंह धर्मयुग छोड़कर आए थे। संजय निरुपम को भी किसी बड़े अखबार का अनुभव नहीं था। भृगुनाथ चौहान कारपेंटर का काम करने खाड़ी देश जाने वाले थे, लेकिन बंबई में ठग लिए गए। वे अपनी तकलीफ लेकर निर्भय पथिक के कार्यालय में गए तो अश्विनी कुमार मिश्र ने उन्हें अपने अखबार का संवाददाता बना दिया। बाद में उन्हें जनसत्ता में काम करने का मौका मिल गया। दीपक पाचपोर के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं। द्विजेन्द्र तिवारी फिल्मों में हीरो बनने आए थे, एक फिल्मी साप्ताहिक अखबार में काम करने लगे, वहां से जनसत्ता में आ गए।
राकेश दुबे यूनिवर्सिटी की परीक्षा पास करने के बाद रोजगार की तलाश में था। पत्रकारिता से उसका लेना देना नहीं था। उसकी नौकरी रहस्यमय तरीके से जनसत्ता में लगी। श्रीनारायण तिवारी का मामला भी ऐसा ही था। वे जनसत्ता के ठाणे स्थित संवाददाता थे। शशिकला राठी पहले एक पत्रिका में काम करती थी। उनके पति विदेश मंत्रालय में अधिकारी थे। उनसे परिचय होने के बाद प्रभाष जोशी ने तत्काल प्रभाव से उन्हें उप संपादक पद से प्रमोशन दे कर वरिष्ठ उप संपादक बना दिया था। भारती पावस्कर का भी बड़े अखबार में काम करने का पहला मौका था।
विद्योत्तमा बगैर किसी प्रशिक्षण के सीधे उप संपादक बनी थी, उसके पिता वायुसेना में अधिकारी थे। रेखा देशपांडे, चंदर मिश्रा, अनंत जोशी, प्राण धाबर्डे और आलोक दुबे का भी बड़े अखबार में काम करने का पहला मौका था। अनंत जोशी गीतकार बनने के लिए बंबई आया था। प्राण धाबर्डे पहले किसी होस्टल में काम करते थे। इंद्रकुमार जैन नागपुर से आया था। नागपुर में वह मेरे सामने नवभारत में भर्ती हुआ था, और उन पांच लोगों में से एक था, जिन्हें खबरें लिखना सिखाने की जिम्मेदारी मुझे सौंपी गई थी। वह प्रतिभाशाली था और काफी काम सीख चुका था। देवेन्द्र राठौड़ खेल के पेज पर रविराज प्रणामी का सहयोगी था। उसके इतिहास के बारे में मुझे जानकारी नहीं।
यह राहुल देव की संपादकीय टीम थी। वे खुद भी किसी अखबार में काम किए हुए पत्रकार मालूम नहीं पड़ते थे। पहले वे सारंगा स्वर शीर्षक से प्रकाशित एक पत्रिका के संपादकीय विभाग में थे। प्रभाष जोशी ने उनमें क्या योग्यता देखी, जिसके आधार पर उन्हें बंबई में जनसत्ता का स्थानीय संपादक बना दिया, यह समझ से परे है और रहस्य का विषय भी। उनकी संपादकीय टीम में सतीश पेडणेकर, गोडबोले और मुझे किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं हो सकती थी, क्योंकि हम अखबार संभालने के अभ्यस्त थे। राकेश दुबे मेरे साथ समाचार डेस्क का काम सीख रहा था।


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