डोंबिवली से रवानगी
ऋषिकेश राजोरिया
डोंबिवली में बिपिन भाई की बताई जगह पर रहना भारी पड़ रहा था। निर्माणाधीन इमारत की पहली मंजिल पर जिस कमरे में सोता था, वहां बिपिन भाई का भाई भी सोता था और कभी कभी एक और रिश्तेदार आ जाता था। टायलेट था, लेकिन बाथरूम जैसी कोई जगह नहीं थी। बिपिन भाई ने काफी पैसे मुझसे ले लिए थे और वापस मिलने की संभावना नजर नहीं आ रही थी। जनसत्ता में कार्यालय का माहौल इंदौर से अलग था। छह टेबलें आमने सामने थीं। टेबलों के ऊपर लाकरनुमा कपबोर्ड बना दिए गए थे। एक बार में करीब बारह लोग बैठ सकते थे। पीछे की तरफ आलमारियां लगा दी गई थीं। बिलकुल ऐसी ही समानांतर कतार बगल में थी, जो गुजराती अखबार समकालीन का संपादकीय कार्यालय था। राहुल देव का अलग छोटा सा केबिन था। जनसत्ता का सत्तर फीसदी मैटर दिल्ली से मोडम से मिल जाता था, इसलिए ज्यादा काम सिर्फ सिटी डेस्क पर होता था। समाचार डेस्क पहले गणेश झा संभालते थे, जो बाद में चले गए। फिर सदानंद गोडबोले डेस्क संभालने लगे। उनके साथ मैं समाचार डेस्क पर काम करता था। सिटी डेस्क संभालते थे पंकज, जो बाद में चले गए। सिटी रिपोर्टर दीपक पाचपोर थे। दिन में सतीश पेडनेकर बैठते थे, जो स्थानीय संपादक के बाद दूसरे नंबर पर थे।
जनसत्ता के साथ साप्ताहिक पत्रिका सबरंग निकलती थी। उसके लिए इमारत की पहली मंजिल पर ही एक अलग कमरा आबंटित किया गया था, जहां धीरेन्द्र अस्थाना बैठते थे। वे सबरंग के प्रभारी थे। उनके सहयोगी संजय निरुपम थे। जनसत्ता के बारे में नईदुनिया में रहते हुए हम न जाने क्या क्या सोचते थे, वैसा कुछ भी यहां नहीं था। संपादक के रूप में राहुल देव की योग्यता यह थी कि वे छैल छबीले थे। उनकी मुस्कराहट बहुत आकर्षक थी। बातें अच्छी करते थे। चेहरे मोहरे से अच्छे थे। अखबार के लिए लिखने पढ़ने का ज्यादातर काम दिल्ली में होता था। प्रभाषजी ने जनसत्ता शुरू करने से पहले अच्छे अच्छे पत्रकारों की खोज की। इंदौर के चार पत्रकारों को नियुक्त करवाया। दिल्ली से कुछ पत्रकार भेजे। शुरू में जनसत्ता बंबई के स्थानीय संपादक अच्युतानंद मिश्र थे। बाद में राहुल देव को स्थानीय संपादक नियुक्त किया गया। उनके आने के बाद जो भयानक राजनीति हुई, उसमें शिव अनुराग पटैरया, विभूति शर्मा और हेमंत पाल मध्य प्रदेश लौट गए थे। दिल्ली से आए पत्रकार या तो छोड़ गए या उन्होंने तबादला करा लिया था। सिर्फ सतीश पेडणेकर बंबई में रहे। मैं ऐसे माहौल में काम कर रहा था।
एक रात मैं बारिश के दौरान दफ्तर से रात 2 बजे डोंबिवली लौटा तो काफी विपरीत परिस्थिति का सामना करना पड़ा। डोंबिवली पूर्व में आटोरिक्शा से उस जगह तक पहुंचा, जहां मैं रहता था। वह इमारत मुख्य सड़क से कुछ दूर थी। वहां तक पहुंचाने वाली गली में काफी पानी भरा हुआ था। कमर तक पानी में इतनी रात को उस इमारत तक पहुंचना बहुत मुश्किल था। बारिश की उस सुनसान रात में मैं वापस रेलवे स्टेशन लौटा और सोचने लगा कि क्या करूं। रात में सारी ट्रेनें बंद हो जाती है, जो सुबह चार बजे बाद बहाल होती है।
मुझे याद आया कि पास ही उल्हासनगर स्टेशन है, जहां प्राण धाबर्डे और राजू गायकवाड़ रहते हैं। मैं ट्रेन आने तक स्टेशन पर बैठा रहा और फिर उल्हासनगर पहुंचा। सुबह करीब 6 बजे प्राण धाबर्डे के घर का दरवाजा खटखटाया। वह उठे। मैंने समस्या बताई। मैं खादी का कुर्ता पायजामा पहने हुए था, जो अब पहनने लायक नहीं बचे थे। हालत खराब हो गई थी। धाबर्डे ने मेरे लिए दो तीन घंटे सोने की व्यवस्था कर दी। नींद निकालने के बाद मैंने स्नान कर लिया और गंदे कपड़े दुबारा पहन लिए। प्राण धाबर्डे ठिगने कद के थे, इसलिए मैं उनके कपड़े नहीं पहन सकता था। नाश्ता करने के बाद मैं उनके साथ राजू गायकवाड़ के यहां पहुंचा। राजू गायकवाड़ अंशकालिक संवाददाता था, जो जनसत्ता में उल्हासनगर की खबरें भेजता था। उसकी कदकाठी मेरे जैसी थी। मैंने अपना गंदा कुर्ता पायजामा उतारकर उसके पैंट शर्ट पहन लिए। दोपहर को प्राण धाबर्डे के घर भोजन कर आराम किया और चार बजे हम लोकल ट्रेन से दफ्तर के लिए रवाना हो गए। इस घटना के बाद तय कर लिया था कि अब डोंबिवली में नहीं रहना है। जब इच्छा प्रबल होती है तो रास्ते भी मिलते हैं।
जनसत्ता में अश्विनी कुमार मिश्र भी सहयोग करते थे, जो अपना एक अलग सांध्यकालीन अखबार निर्भय पथिक निकालते हैं। मैं उन्हें रोजाना देखता था। ज्यादा बातचीत नहीं हुई थी। प्राण धाबर्डे ने उनसे बातचीत कराई। उन्होंने मेरी समस्या समझी। घाटकोपर के भाजपा विधायक प्रकाश मेहता से उनका संपर्क था। गेटवे ऑफ इंडिया के पास मेजेस्टिक एमएलए होस्टल में उनका कमरा था। अश्विनी कुमार मिश्र के कहने से उन्होंने मुझे एमएलए होस्टल स्थित अपने कमरे में रहने की अनुमति दे दी। पहली मंजिल पर कमरा नंबर 114 में 2 कमरे थे। फोन था और शानदार बाथरूम टायलेट थे। वहां पहले से कश्मीर के भरत पंडित और गुजरात के राजेन्द्र जडेजा रहते थे। मैंने डोंबिवली की वह निर्माणाधीन इमारत छोड़ी और एमएलए होस्टल में रहने लगा।


0 टिप्पणियाँ