कुछ तबस्सुम हैं जो अश्कों का मज़ा देते हैं

और कभी अश्क भी होठों को हँसा देते हैं


कोई तो बात है इस दर पे कि जिसके बाइस

लोग नज़रें ही नहीं सर भी झुका देते हैं


एक तू है कि जिसे हर्फ़े-वफ़ा याद नहीं

एक हम हैं जो तुझे अब भी दुआ देते हैं


ग़म के दरवाज़े ही खुलते हैं हमारी जानिब

जब भी ख़ुशियों को कभी हम जो सदा देते हैं


ज़िन्दगी ऐसी है तज़मीन कि जिसमें अक्सर

लोग बेबह्र से मिसरे भी लगा देते हैं


अपनी नज़रों पे भरोसा ही हमें रखना है

"रहनुमा राह को दुश्वार बना देते हैं" 


ये जो कमज़र्फ़ से क़तरे हैं कहीं दरिया में

ये तो 'साहिल' पे भी तूफ़ान उठा देते हैं

©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'