पुत्र का जन्म
ऋषिकेश राजोरिया
नईदुनिया में कुछ नए पत्रकार भर्ती हुए थे। भूपेन्द्र चतुर्वेदी, हेमंत पाल, नीलमेघ चतुर्वेदी, अजय बोकिल और दो अन्य। उनकी ट्रेनिंग पूरी हो चुकी थी और वे विभिन्न डेस्कों पर नियुक्त किए जा चुके थे। उनमें नीलमेघ चतुर्वेदी डाक की डेस्क पर थे जहां मुझे भी नियुक्त किया गया था। रवीन्द्र शाह और मीना राणा की शादी हो चुकी थी और दोनों नईदुनिया छोड़ चुके थे। अखबारों में डेस्कों पर काम चलता रहता है। उसके उपसंपादक बदलते रहते हैं। डाक की डेस्क पर 128 विधानसभा क्षेत्रों की खबरें पहुंचती थी। कंप्यूटर का अस्तित्व नहीं था। कई खबरें छापने लायक भाषा में दुबारा लिखनी पड़ती थी। भानु चौबे, नीलमेघ चतुर्वेदी और मैं, हम तीनों दिन भर खबरें कंपोज करने के लिए भेजते रहते। पांच छह बजे से पेज लगाना शुरू करते। दो घंटे में पांच पेज लगवा देते थे। दोपहर को कैंटीन में जाकर भोजन करते। पेज लगाने के लिए एक अलग कक्ष था। पेज लगाने वाले अलग थे, जो उप संपादकों के निर्देश पर पेज लगवाते थे। लड़कियां भी थीं। इस तरह जिंदगी की गाड़ी आगे बढ़ रही थी। कोई समस्या नहीं थी।
डाक की डेस्क पर आने से पहले प्रभु जोशी से घनिष्ठता बढ़ गई थी। मैं उनके घर जाने लगा था। वे जबरदस्त लेखक थे। विश्लेषक थे। कहानीकार थे। चित्रकार थे। फिल्म निर्माता थे। और भी पता नहीं क्या क्या थे। उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। उन्होंने नईदुनिया के रविवारीय परिशिष्ट के लिए अतुलनीय योगदान दिया था। फ्रांस की राज्य क्रांति के 200 वर्ष पूरे होने पर उन्होंने शानदार संग्रहणीय परिशिष्ट निकाला था। आकाशवाणी में वे हर साल इनोवेटिव कार्यक्रम बनाते थे। यह कार्यक्रम इन हाउस होता है और आकाशवाणी के अधिकारी ही तैयार करते हैं। उनके कार्यक्रमों में मैंने मदद की। आकाशवाणी में मशीनों पर बैठकर ट्रांस्क्रिप्शन किया। उसके पैसे नहीं मिलते थे, लेकिन कभी कभी युव वाणी कार्यक्रम के लिए कविताएं पढ़ देता था, उसका चेक मिल जाता था।
नईदुनिया में संपादकीय पेज पर बीच में एक छोटा सा व्यंग्य अधबीच शीर्षक से छपता था। उसके लिए मैं कई बार व्यंग्य लिखकर देता था, लेकिन वे बिलकुल नहीं छपते थे, क्योंकि यशवंत व्यास के मुताबिक वे स्तरीय नहीं होते थे। वह अभयजी के पास ही बैठते थे और अभयजी की तारीफ करने का कोई अवसर नहीं चूकते थे। उनका मानना था कि नईदुनिया में साहित्य का सिरमौर उन्हें ही माना जाना चाहिए। इसलिए दफ्तर का कोई भी व्यक्ति कितना ही अच्छा लिखे, वह उनके लिए कभी भी महत्वपूर्ण नहीं हो सकता था। व्यवस्थाएं ऐसी ही होती हैं और ऐसे लोग हर जगह पाए जाते हैं। मालिकों के लिए ऐसे लोग अच्छे खासे उपयोगी होते हैं। वैसे लिखना, पढ़ना, संपादन करना मेरे लिए कठिन कार्य नहीं और संगीत कार्यालय, हाथरस से लेकर प्रभात किरण, नवभारत इंदौर, नागपुर तक और अब नईदुनिया में जो कुछ सीख समझ रहा था, उससे यशवंत व्यास का कोई लेना देना नहीं था।
इस दौरान मेरे घर 5 सितंबर 1989 की रात करीब 12 बजे के बाद गायत्री मां बनी। पुत्र का जन्म हुआ। मैं लक्ष्मीनारायण वर्मा के साथ उसे देखने एमवाय अस्पताल गया। गायत्री के साथ मेरी नानी भी मौजूद थी। मैंने उसका नाम तन्मय रखा। वह बड़ा होने लगा था। मैं डाक की डेस्क पर आने के बाद खबरों के संपादन में इस कदर व्यस्त रहता कि कब शाम हो जाती, पता नहीं चलता। रात 8-9 बजे तक घर पहुंच जाता। इसलिए साहित्य पढ़ने और अन्य विषयों पर लिखने के सिलसिले पर विराम लगा। लेकिन यह सिलसिला ज्यादा नहीं चला। वह जुलाई 1990 का पहला हफ्ता था। बारिश हुई थी। डाक के पेज पर विभिन्न इलाकों में हुई बारिश की खबर छपी थी। उसका शीर्षक छप गया जून के पहले हफ्ते में कई जगह बारिश। नईदुनिया में रोजाना शाम को चार पांच बजे बैठक होती थी, जिसमें सभी अभयजी के सामने खड़े रहते। अभयजी सभी संस्करणों के पन्नों की समीक्षा सबके सामने करते। उसमें शीर्षक में जुलाई की जगह जून छपने की आलोचना हुई। महेन्द्रजी ने उसके लिए मुझे जिम्मेदार माना और वापस प्रूफ टेबल पर काम करने का फरमान सुना दिया।


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