संतुलित जीवन का महत्व
ऋषिकेश राजोरियानईदुनिया में काम करते हुए जीवन के अनमोल अनुभव हुए। सबसे बड़ा अनुभव यह हुआ कि पति पत्नी के बीच संतुलित जीवन का क्या महत्व है। यह समझ में आना जरूरी है। आम तौर पर होता यह है कि जब लड़की और लड़के की शादी होती है तो दोनों को अपना परिवार कैसे चलाना चाहिए, इसका कोई प्रशिक्षण नहीं मिलता है। लड़की जब बारात के साथ विदा होती है, तो उसे कुछ भी मालूम नहीं होता कि ससुराल में उसके साथ क्या होने वाला है। लड़का पौरुष से भरा हुआ होता है। शादी के बाद दोनों संयमित जीवन नहीं जी पाते। कुछ महीनों बाद लड़की गर्भवती हो जाती है। जब वह मां बन जाती है, तो उसके शरीर में भी काफी परिवर्तन हो जाते हैं। लड़का शादी से पहले जैसा पौरुष से भरा हुआ नहीं रह पाता और इससे दांपत्य संबंधों में तनाव की परिस्थितियां बन जाती हैं। ऐसी परिस्थिति मेरे साथ नहीं बनी। मैंने कई लोगों को देखा है। वे कामुकता से भरे हुए होते हैं। रात दिन इसी के बारे में सोचते रहते हैं। इस मामले में समाज की स्थिति वीभत्स है। रुपया पैसा और काम वासना, इसके अलावा दुनिया में कुछ और है या नहीं, इसमें दिमाग लगाने वालों की संख्या बहुत कम है।
गायत्री के साथ रहते हुए और नईदुनिया में प्रूफ रीडरी करते हुए जिंदगी में स्थिरता आने लगी थी। उस दौरान प्रभु जोशी से मुलाकात हुई, जो आकाशवाणी में अधिकारी थे और नईदुनिया के फीचर पन्नों में सहयोग करते थे। उन्हें सभी प्रभु दा कहते थे। मैंने देश में शिक्षा की स्थिति पर एक लेख लिखा तो उन्होंने छाप दिया। बड़ा लेख था। काफी तारीफ हुई। उसके बाद उन्होंने लेख छापने बंद कर दिए। पूछने पर उन्होंने बताया कि प्रूफ रीडर को एक्सपोजर मिलने से कुछ लोग नाराज हैं। जिन विषयों पर जो लोग पहले से लिख रहे हैं, उन विषयों पर मत लिखा करो। उस समय नईदुनिया में शिक्षा पर शंकर विजयवर्गीय के लेख छपा करते थे। राजनीतिक मामलों पर लिखने वाले भी तय थे। मैंने उनसे कहा, फिर आप ही कोई विषय बताइए। उन्होंने कहा कि बैंड बाजे वालों पर लेख तैयार करके लाओ।
मैं बैंड बाजों पर लेख तैयार करने में जुट गया। यह पता लगाया कि सबसे पहले बैंड किसने कहां बजाया था। ब्रिटैनिया एनसाइक्लोपीडिया से जानकारी मिली कि एक बार जर्मन सैनिकों ने फुरसत के समय संगीत का उपयोग किया था, वहीं बैंड की नींव पड़ी। फिर इंदौर में जितने बैंड बाजे वाले थे, उनके यहां चक्कर लगाए। बैंड में इस्तेमाल होने वाले वाद्य यंत्रों की जानकारी जुटाई। बैंड वालों की उपस्थिति आम तौर पर विवाह समारोहों में होती है। उससे कितनी कमाई होती है। कुछ वाद्य मुंह से फुलाकर बजाने पड़ते हैं, जिनसे गालों पर जोर पड़ता है। उनकी वजह से क्या तकलीफें होती हैं। बैंड वाले कहां रहते हैं। उनका सामाजिक स्तर क्या है। बैंड और आर्केस्ट्रा में क्या अंतर है। सेना के बैंड और साधारण बैंड में क्या फर्क है। ये तमाम जानकारियां जुटाकर, दो तीन लेख मैंने प्रभु दा को सौंप दिए। उनको वे लेख छापने पड़े।
लिखने का सिलसिला जारी रहा। मैं रोजाना शाम सात बजे से पहले दफ्तर पहुंचता था और घर लौटने में रात के तीन चार बज जाते थे। सुबह दस ग्यारह बजे सोकर उठता था। उसके बाद दिन भर कोई काम नहीं होता था। इस खाली समय का उपयोग करने के लिए मैंने अर्थशास्त्र में एमए करने की तैयारी शुरू कर दी। विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में काफी समय गुजरने लगा, जहां मैं विषय से संबंधित कम, अन्य किताबें ज्यादा पढ़ता था। एमए के पहले साल की परीक्षा मैंने दे दी, इसके बाद पढ़ाई छूट गई। नईदुनिया में माथुर साहब की छुट्टी के दिन थ्री स्टार का पेज लगवाने का जिम्मा मुझे सौंप दिया गया था। इस तरह मैं उप संपादक की भूमिका में आ रहा था। कुछ ही दिन बाद मुझे पूरी तरह डाक की डेस्क पर नियुक्त कर दिया गया। भानु चौबे प्रभारी थे। नीलमेघ चतुर्वेदी सहयोगी थे। मैं उनके साथ था। तीनों पर शाम तक पांच पेज लगाने की जिम्मेदारी होती थी। इस तरह रात की ड्यूटी से मुक्ति मिली।


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