कभी घात के
कभी प्रतिघात के
कभी चाह के
कभी डाह के
कभी नेह के
कभी देह के
कभी बोध के
कभी शोध के
कभी वाह के
कभी आह के
कभी मान के
कभी अपमान के
बुनता रहता है
अनवरत
कैसे-कैसे
घुमावदार और घने
और
अपनी सुविधा के
अनुसार
पकड़ बदलने वाले
लचीले जाले ,
ये मेरा मन है
या है कोई
मकड़ी !
©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'


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