जिसकी ख़ातिर तोड़ दिया था इसने रिश्तों का पिंजरा

चाहत के उस मिठ्ठू को अब लगता है अच्छा पिंजरा


हम हैं ऐसी रूह कि जिसका जिस्म बदलता है हर दिन

रोज़ नया लगता है हमको ये देखा भाला पिंजरा


सोने के दाने डालो या मोती जैसी बात करो

पिंजरे में रहने वाले से पूछो क्या होता पिंजरा


दिल ने सबको ताबीरों की शक्ल में ढलते देखा है

रोक कहाँ पाया उड़ने से ख़्वाबों को कसता पिंजरा


दोनों को ही इक-दूजे से आज़ादी की चाहत है

उलझ रहा हूँ मैं पिंजरे से और मुझसे मेरा पिंजरा


मैं ही कुछ भी देख न पाया अब मुझसे हमदर्दी क्यों

उसकी आँखों में जाले थे और बातों में था पिंजरा


जाने कैसे-कैसे मोती किस सीपी में बंद यहाँ 

दरिया की लहरें हैं 'साहिल' या है पानी का पिंजरा

©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'