पदयात्रा में शामिल

ऋषिकेश राजोरिया 

महाराष्ट्र में नासिक जिले के उमराणा में जिसे मैं धर्मशाला समझ रहा थावह दरअसल स्कूल था। उसकी छत पर पदयात्रियों के बीच लेटे हुए नींद आने से पहले मैं आसमान को देख रहा थाजो साफ था और तारे झिलमिला रहे थे। चंद्रशेखर के बारे में मैं कुछ नहीं जानता थासिवाय उसके जो अखबार में उनके बारे में पढ़ा था। नीचे एक कमरे में उनकी झलक देखी थी। वे एक खटिया पर लेटे हुए थे। सफेद धोती कुर्ता पहने हुए। हल्की दाढ़ी। पैदल चलने से थके हुए। उन्होंने मुझे देखा या नहींमेरी तरफ ध्यान दिया या नहींमैं नहीं जानता।

स्कूल में ठहरे हुए पदयात्रियों की संख्या सौ के आसपास होगी। वे कौन थेकहां से आए थेइसकी जानकारी मुझे सुबह ही मिल सकती थी। मैं भी दिन भर से थका हुआ था। डटकर भोजन कर लिया थाइसलिए जल्दी ही नींद लग गई। सुबह चार बजे नींद खुल गई। जो मंदिर में रहते हुए रोज खुल जाती थी। मेरी ही तरह कई और लोग भी आंखें मसलते हुए उठने लगे थे। वहां शौचालय और स्नानघर थे। मैंने जल्दी उठकर उनका उपयोग कर लिया। पांच साढ़े पांच बजे मैं तैयार था। मंदिर से रवाना होते समय कंघी लाना भूल गया थाइसलिए बाल उंगलियों से ही जैसे तैसे पीछे कर लिए थे। साढ़े छह बजे तक सभी पदयात्री स्नान करके तैयार हो चुके थे। उनके लिए चाय की व्यवस्था हो गई थी।

पदयात्रियों के साथ कुछ गाडियां भी चलती थीं। उनमें एक ट्रक थाजिसमें पदयात्रियों का सामान रखा जाता था। मैंने भी तैयार होने के बाद अपना संदूक उस ट्रक में रख दिया। अन्य गाडियों में एक वैन शामिल थीजिसका उपयोग रसोईघर के रूप में और खाने पीने का सामान रखने में होता था। सुबह सात बजे के करीब सभी पदयात्री स्कूल से बाहर निकल आए और तैयार होकर निकले। चंद्रशेखर के साथ सबने राष्ट्रगान गाया और तेजी से चल पड़े। सबसे आगे एक व्यक्ति जनता पार्टी का झंडा लेकर चलता था।

चंद्रशेखर बहुत तेजी से चलते थे। बहुत कम लोग उनकी बराबरी से चल पाते थे। पैदल चलने पर एक घंटे में करीब पांच किलोमीटर की दूरी तय होती है। एक घंटा चलने के बाद पदयात्री कहीं पेड़ के नीचेया किसी गांव में कुछ देर रुक जाते। कुछ नाश्ता हो जाता। बैठने के लिए तिरपाल बिछा ली जातीजो गाड़ी में रखी रहती थी। पदयात्रा में चंद्रशेखर के साथ प्रमुख लोग जो दिखेवे उत्तर प्रदेश के थे। भाई वैद्य महाराष्ट्र के थे। मंत्री रह चुके थे। पदयात्री कई राज्यों के थे। ज्यादातर केरलतमिलनाडु और कर्नाटक के थेजो पदयात्रा की शुरूआत से ही साथ हो लिए थे। कुछ लोग महाराष्ट्र के थेराजस्थान के भी थे। मध्य प्रदेश के तीन चार लोग थेजिनसे मेरा परिचय हुआ। सबसे पहले सुरेन्द्र घनघोरिया और महेन्द्र वैष्णव से परिचय हुआ। उन्होंने उमेश चतुर्वेदी से मिलवाया। मैं पदयात्रा में उनके साथ हो गया। बातचीत होने लगी।

दोपहर तक रुकतेचलते करीब 15 किलोमीटर का रास्ता तय करने के बाद एक स्थान पर पदयात्रियों के लिए भोजन का प्रबंध था। वहां भोजन करने के बाद करीब चार बजे तक आराम। फिर रवानगी। उमेश चतुर्वेदी ने बताया कि बंबई के एक व्यक्ति ने सभी पदयात्रियों के लिए खादी के पैंट शर्ट दिए हैं। वह कवि से या सोलंकी से ले लेना। कवि थे अवध बिहारी सिंहजो चंद्रशेखर की पदयात्रा पर कविताएं लिखते थे। दिन समाप्त होने के कुछ घंटे बाद पदयात्रा एक कस्बे में रुकी। वहां सभा जैसा माहौल था। चंद्रशेखर ने संबोधित किया। सभी पदयात्री उमराणा की तरह स्कूल में रुके। भोजन करने के बाद सो गए। कुछ लोग उस मंच पर सो गएजो चंद्रशेखर के अभिनंदन के लिए बनाया गया था।

सुबह चतुर्वेदी की बात याद कर मैं मंच पर तैयार हो रहे सोलंकी और कवि के पास पहुंचा। सोलंकी दाढ़ी बना रहे थे। कवि धोती पहन रहे थे। मैंने उनसे नमस्कार किया। मैं उनके लिए अपरिचित था। मैंने उनसे कहा कि मैं पदयात्री हूं और बंबई में पदयात्रियों के लिए जो कपड़े मिले हैंवे आपसे लेने के लिए मुझसे चतुर्वेदी ने कहा है। सोलंकी ने कहातेरे पास कपड़े नहीं है क्याकपड़े नहीं थे तो पदयात्रा में क्यों आयाकवि ने कहापता नहीं कहां कहां के भिखमंगे पदयात्रा में शामिल हो गए हैं। उनकी बातें मुझे बहुत बुरी लगी। मैं थोड़ी देर उनकी शक्लें देखता रहा। वे दोनों मुझे अहंकार की प्रतिमूर्ति लग रहे थे। यह एकदम सुबह की घटना थी, जिसने मेरा मूड ऑफ कर दिया था। पदयात्रा रवाना होने वाली थी। मुझे अपमान महसूस हुआ और मैं मंच के सामने से हटकर पास ही एक कुएं के पास पहुंच गया। मुझे रोना आ गया था। कुछ देर कुएं के पास बैठकर रोता रहा। फिर तैयार होकर फिर पदयात्रियों के बीच शामिल होकर चंद्रशेखर के साथ राष्ट्रगान गाकर अगले पड़ाव की तरफ रवाना।

रास्ते में मैं यह विचार करने लगा कि इस कवि ने मुझे भिखमंगा क्यों कहा और सोलंकी ने बदतमीजी क्यों कीमैंने महेन्द्र वैष्णव को यह घटना बताई। विचार करने पर ज्ञात हुआ कि कंघी नहीं होने से बाल बुरी तरह बिगड़े हुए थे। पेंट भी ग्रे रंग की थीऔर शर्ट भी भूरे रंग का था। मतलब मेरा रंग रूप ऐसा ही थाजिसे देखकर मुझे भिखमंगा समझा जा सकता था। अब मेरे सामने चुनौती थी कि पदयात्रा में इस तरह जो बेवजह अपमान हुआ हैउसका बदला कैसे लिया जाए। 

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)