हो भले बिखराव कितना

किन्तु ख़ुद में रत रहूँ मैं


सहमति किसको न भाती

शत्रुता लेकिन न आती

स्नेह की बारात में हूँ

मैं सदा से ही घराती

बैर की इन बारिशों में

प्यार की आदत रहूँ मैं


खींचता मुझको पुरातन

पर लुभाता भी है नूतन

चाहता हूँ सोच में हों

भाव सारे ही सनातन

मूल्य हों बेशक़ पुराने

दृष्टि से आगत रहूँ मैं


लाँघता हरगिज़ न रेखा

मौन को मैंने है देखा

हूँ नहीं मुन्सिफ़ जो जाँचे

दूसरों का कर्म-लेखा

हो भले अतिवाद कितना

सन्तुलित सा मत रहूँ मैं


जी रहा मुश्किल समय में

हाँ मगर अपनी ही लय में

चाहता मुस्कान बाँटू

हर निलय में हर हृदय में

सूचना ख़ुशियों की लाये

वो अनोखा ख़त रहूँ मैं


है यही मेरा मुक़द्दर

ठोकरें खाऊँ सँभल कर

अर्थ की बातें करूँ मैं

धर्म के चोले में अक्सर

काम में लिपटा रहूँ पर

मोक्ष की चाहत रहूँ मैं


लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)