आदमी को आदमी से प्यार होना चाहिए
ज़ात-मज़हब से परे हर बार होना चाहिए
हो चुकीं अब तो ख़लिश की सब हदें कब की तमाम
अब तो तीरे-नीमकश को पार होना चाहिए
लोग पत्थर भी न मारें और समझाने लगें
क़ैस को इतना नहीं लाचार होना चाहिए
सूर को जो हो गया था बन्द आँखों से कभी
अब तो मुझको भी वही दीदार होना चाहिए
एक दिन ऐसा हो अब तो इस पुरानी जंग में
पत्थरों पे आइनों का वार होना चाहिए
क्या पता इस ही बहाने हो सकूँ उनके क़रीब
सोचता हूँ कुछ दिनों बीमार होना चाहिए
आ रही हैं तेज़ लहरें बढ़ के इसकी ही तरफ़
अब तो 'साहिल' को भी कुछ हुशियार होना चाहिए
लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)


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