सिर्फ एक जनसमूह नहीं हैं हिंदू


ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।

जिन लोगों की जीवनशैली हिंदुत्व पर आधारित है, वे यह कैसे स्वीकार कर सकते हैं कि कोई भी उन्हें अपनी मर्जी से एक जनसमूह के रूप में इस्तेमाल कर सकता है। मुसलमान शासकों ने ऐसा किया, उनकी सत्ता चली गई। अंग्रेजों ने ऐसा किया, उनको भी यहां से जाना पड़ा। अंग्रेज तो चले गए, लेकिन उनके शासन के जो अवशेष यहां रह गए हैं, वे भी कभी न कभी विदा हो जाएंगे। भारत में वैचारिक प्रवाह सनातन धर्म पर ही आधारित रहेगा, जिसका मूल वेदांत दर्शन है। सनातन धर्म में कट्टरता बिलकुल नहीं है। इस धर्म का पालन करने वालों को अपनी आस्था के बारे में स्पष्ट विचार व्यक्त करने की पूरी स्वतंत्रता है। इस देश में शास्त्रार्थ और वाद-विवाद का एक लंबा सिलसिला है, जो रुकना नहीं चाहिए। अगर कोई इसे रोकने का प्रयास करता है और उसकी नीति और नीयत पर संदेह किया जा सकता है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र के लिए अनिवार्य होनी चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदी लगाने या रोकने के कोई भी प्रयास ज्यादा दिन नहीं चल सकते। चालाकी और चतुराई में भारतीयों का मुकाबला कोई नहीं कर सकता। लोकतंत्र की राजनीति में भी यह चालाकी और चतुराई कदम-कदम पर देखी जा सकती है। चालाकी और चतुराई के आधार पर ही नेहरू ने अपनी तरह से शासन चलाया। यही इंदिरा गांधी ने किया और जितने भी प्रधानमंत्री हुए हैं, वे सब अपनी राजनीतिक चतुराई और चालाकी से ही बने हैं। कौन कितना हिंदुत्व के प्रति समर्पित है, यह अलग बात है लेकिन इस देश पर जो भी शासन करता है, वह हिंदुओं के समर्थन के बगैर नहीं कर सकता। कांग्रेस ने अल्पसंख्यक और जाति आधारित तुष्टिकरण की नीति अपनाई। हिंदुओं ने उसे पूरी तरह नकार दिया। अब यह देखा जा रहा है कि कांग्रेस के निबटने के बाद जो लोग शासन संभाले हुए हैं, वे हिंदुओं का कितना हित कर रहे हैं।

सरकार से भारत के लोगों की उम्मीदें ज्यादा बढ़ी-चढ़ी नहीं होती है। वे मन लगाकर ईश्वर को साक्षी मानकर कर्म करते हैं और ज्यादातर लोगों का लक्ष्य यही रहता है कि उनका सामाजिक जीवन सुविधाजनक तरीके से चलता रहे, उनकी आजीविका चलती रहे। भारतीयों की इस प्रवृत्ति का अंग्रेजों ने जमकर फायदा उठाया। उन्होंने अपने हिसाब से लिखा-पढ़ाकर बड़े पैमाने पर सरकारी नौकरियां बांटी। अंग्रेज सरकार की सेना के तमाम सैनिक भारतीय ही होते थे और ज्यादातर लोग जीविकोपार्जन के लिए सेना में भर्ती होते थे। अंग्रेज सरकार के तमाम भारतीय अधिकारी और कर्मचारी ऐसे ही थे। यही पूरा ढांचा देश स्वतंत्र होने के बाद भी वैसा का वैसा ही बरकरार रहा। यही कारण है कि भारत इतना बड़ा अखंड राष्ट्र बन जाने के बाद भी काफी पिछड़ा हुआ है।

लोकतंत्र स्थापित होने के बाद भी सरकार वही है, जो अंग्रेज चलती हुई छोड़ गए थे। उसी को कांग्रेस संभालने लगी थी और आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू हुए, जिन्होंने जनता की धार्मिक भावनाओं का अध्ययन करते हुए खुद की महानता स्थापित करने के नाटकीय प्रयास किए और देश को एक धर्म निरपेक्ष स्वरूप में ढालने की कोशिश की। स्वतंत्रता आंदोलन में गांधी की भूमिका महत्वपूर्ण थी। उन्होंने अंग्रेजों को पहले दक्षिण अफ्रीका में, उसके बाद भारत में चुनौती दी थी, जिससे वह जनता में पूजनीय बने। पूरी कांग्रेस पार्टी उनके अनुयायी की तरह चली।

नेहरू ने स्वयं को गांधी के प्रथम शिष्य के रूप में प्रचारित किया। अपनी विशेष वेशभूषा, धर्म निरपेक्ष विचारधारा, प्रचार के माध्यम से एक आदर्श के रूप में अपनी छवि स्थापित करने का प्रयास किया, जबकि हकीकत यह थी सरकार अपने अधीन आ जाने के बाद उन्होंने गांधी की विचारधारा को लाल कपड़े में बांधकर उस पर महात्मा का लेबल लगाकर उसे पुरातत्व की श्रेणी में डाल दिया था। गांधी की आड़ में उन्होंने खुद का जमकर प्रचार किया। उनकी सुंदर तस्वीरें अनिवार्य रूप से सरकारी कार्यालयों में लगने लगी।

कांग्रेस के प्रचार में नेहरू के नाम और उनकी तस्वीरों का उपयोग होने लगा। इस तरह अंग्रेजों की बनाई खटारा हो चुकी सरकार चलाते हुए 14 साल बाद वह पर्याप्त रूप से महान हो चुके थे। उनकी हैसियत इतनी हो चुकी थी कि उनके वंशज इस देश पर अपना अधिकार बनाए रख सकें। गांधी भारत में अंग्रेजी शासन की प्रताड़ना से भारतीयों को बचाने के लिए जीवनभर सच्चे मन से, पूरी ताकत और ईमानदारी से जुटे रहे। इसी लिए भारतीय लोग उन्हें सच्चा संत मानते हैं, जिनके जीवन में कोई भी अतिरिक्त आडंबर नहीं देखा गया। जिनका हर शब्द, हर कार्य मिसाल बना। 

भारत में यह अंतर साफ देखा जा सकता है। कुछ लोग अपनी योग्यता और प्रतिभा से स्वतः ही समाज में अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लेते हैं, जैसे बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद सरस्वती, गुरु नानक, गांधी आदि। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो प्रचार तंत्र का उपयोग करते हुए महान बनने का प्रयास करते हैं। इतिहास सभी को दर्ज करता रहता है कि कौन ईमानदारी से समाज के हित में काम करता रहा और किसने खुद का प्रचार करते हुए महान बनने की कोशिश की। इतिहास अपना काम करता है, लेकिन वर्तमान हमेशा समाज की जिम्मेदारी संभालने वालों की करनी से प्रभावित होता रहता है। जो लोग हिंदुत्व के प्रति आस्था रखते हैं, उन्हें इस तथ्य की तरफ अवश्य ध्यान देना चाहिए। 

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)