ब्यूरो रिपोर्ट!
कोरोना वायरस ने पिछले 1 साल के दौरान हमारे जीवन से जुड़े हर पहलू की तस्वीर बदल कर रख दी है। इसने हमारी आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संरचना को एक तरह से तहस-नहस कर दिया है। दूसरी लहर के कहर ने मानव को भीतर तक झकझोर दिया है। आम आदमी हर तरह से लाचार दिखाई दे रहा है और सरकारें बेबस नजर आ रही है। इस बीमारी के इलाज के दौरान परिजन अपने नजदीकी रिश्तेदार की जान बचाने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं और इसी आपाधापी के दौरान जब मरीज की मौत हो जाती है तो फिर से शुरू होता है। हालात से लड़ने का मंजर और बेबसी का आलम। गुरुवार की देर रात पड़ोस में। एक महिला की मौत हो जाने के बाद सामने आए। सामाजिक हालातों ने भीतर तक झकझोर दिया। एक कलमकार होने के साथ ही इंसानियत निभाने के नाते हम भी रात भर उनके साथ मौजूद रहे। अंतिम क्रिया से जुड़ी सारी प्रक्रिया पूरी करने के बाद जब शमशान पहुंचे तो वहां गुजारे 3 घंटे के समय ने पत्रकार मन को भीतर तक झकझोर दिया। छोटी सी अवधि में ही वहां 13 शवों का अंतिम संस्कार अपनी आंखों के सामने देखा। दोपहर की तपती धूप के बीच मुश्किल से आठ 10 लोग अपने परिजन की अर्थी लेकर आते दिखाई दिए। गिनी चुनी संख्या में मौजूद शमशान कर्मी इतने व्यस्त मुझे मेरे जीवन में कभी नजर नहीं आए। हमें भी अपनी बारी के लिए काफी देर तक इंतजार करना पड़ा। लगभग डेढ़ घंटे बाद एक श्मशान कर्मी आया। तब जाकर दाह संस्कार की प्रक्रिया शुरू हुई। यह बात है राजधानी जयपुर के सबसे बड़े श्मशान में शुमार चांदपोल शमशान की। यहां आमतौर पर रोजाना सात आठ शवों का अंतिम संस्कार होता है। लेकिन इन दिनों यह संख्या 30 से 40 के बीच पहुंच गई है। यह आंकड़ा तो सिर्फ जुबानी है। कई कर्मचारी इसके 50 से 60 होने का दावा भी करते हैं। और उनका दावा एक तरह से सही भी नजर आया जब 3 घंटे की अवधि में ही आंखों के सामने 13 अर्थियां वहां पहुंच गई तो दिन भर में आंकड़ा 50 के पार तो पहुंचता ही होगा। इस दौरान अंतिम संस्कार के लिए आए लोगों के चेहरे ही बता रहे थे कि वे कोरोना काल के कई हालातों से जूझते हुए यहां तक पहुंचे हैं। यह सब देख कर मन में पीड़ा भर आई, एक ठसक सी उठी। मन ही मन वहां बैठे हुए ईश्वर से यही अरदास की कि हे प्रभु! ऐसे लाचारी के हालात अब मत दिखाओ तरस खाओ, तरस खाओ, संभालो, अब तो संभालो।


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