गुजरात की कवियित्री पारुल खख्खर ने 14 पंक्तियों की एक कविता गुजराती में क्या लिख दी कि पूरी गुजरात सरकार की नींद उड़ गई। ाखित कविता है ही एक दम खरी खरी। गुजरात के ही इलियास शेख ने इसका हिंदी अनुवाद भी कर दिया जो सोशल मीडिया पर जबरदस्त वायरल हो रहा है। अब कविता से सहमत होना ना होना पढ़ने वाले की व्यक्तिगत स्वतंत्रता है पर अभिव्यक्ति की रक्षा का दायित्व तो हमें निभाना ही है।
शववाहिनी गंगा
रचना - पारुल खख्खर
अनुवाद - इलियास शेख
एक साथ सब मुर्दे बोले
' सब कुछ चंगा चंगा ',
साब, तुम्हारे रामराज में
शववाहिनी गंगा।
ख़तम हुए शमशान तुम्हारे,
खतम काष्ठ की बोरी;
थके हमारे कंधे सारे,
आखें रह गई कोरी;
दर-दर जाकर यमदूत खेलें
मौत का नाच बेढंगा।
साब, तुम्हारे रामराज में
शववाहिनी गंगा।
नित्य निरंतर जलती चिताएं
राहत मांगे पल भर;
नित्य निरंतर टूटती चूड़ियाँ,
कुटती छाती घर-घर;
देख लपटों को फिडल बजाते--
वाह रे 'बिल्ला-रंगा' !
साब, तुम्हारे रामराज में
शववाहिनी गंगा।
साब, तुम्हारे दिव्य वस्त्र,
दिव्यत तुम्हारी ज्योति;
काश, असलियत लोग समझते,
हो तुम पत्थर, ना मोती;
हो हिम्मत तो आके बोलो,
'मेरा साहब नंगा'
साब, तुम्हारे रामराज में
शववाहिनी गंगा।


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