दोनों की है अलग भूमिका दोनों का है काम अलग
लेकिन अक्सर ही आते हैं दोनों इक दूजे के काम

क़लम बुद्धि का परिचायक है बल का परिचायक तलवार
किन्तु लक्ष्य से जब भी भटकें दोनों ही करते संहार
तलवारों का मारा जग में बच भी सकता है लेकिन
कभी न खाली गया जगत में किसी क़लम का कोई वार
खड़ी हुई हैं सब तलवारें किसी क़लम के पीछे ही
क़लम अगर आदेश न दे तो तलवारें हैं केवल नाम

जितने भी हैं धर्म जगत में सब क़लमों के जाये हैं
इन्सानों ने अपनी ख़ातिर ये सब यहाँ बनाये हैं
और धर्म ने ही दुनिया को तलवारों का खेल दिया
इसी खेल ने सबसे ज़्यादा जग में शीश कटाये हैं
मेरा मज़हब सबसे अच्छा दूजे का बिल्कुल बेकार
इसी तर्क से रोज़ कर रहे हमी ईश्वर को बदनाम

जो हो तलवारों के दम पर जीत अन्त में वह रोती
अन्तिम जीत क़लम से होती जो सबमें ख़ुशियाँ बोती
दोनों की आकृति एक सी लेकिन दोनों की परिणति
जिन हाथों ने पकड़ा उनकी नीयत पर निर्भर होती
बात अगर हो सत्व सृजन की तो बस क़लम सनातन है
तलवारें हो जातीं हरदम सत्व-सृजन सम्मुख नाकाम

जिसने भी जब-जब दुनिया में क़लम उठा तलवार तजी
उसके घर की चौखट पर ही जग की हर तलवार सजी
जिसने जब-जब तलवारों का काम क़लम से लिया यहाँ
उसकी अपनी अर्थी पर ही जग भर की फ़टकार बजी
यदि घमण्ड में सने क़लम तो विनाश का मौसम हो
तलवारों से ही मिलता है उसकी तृष्णा को आराम

सबसे अच्छा हो हम मिलकर तलवारों का त्याग करें
धर्म-जाति के अंगारों को कभी न भड़की आग करें
हर मानव दूजे मानव को समझे ख़ुद जैसा मानव
सभी क़लम के रचनाधर्मी लेखन से अनुराग करें
तलवारों को क़लम बना लें प्रेम तथा करुणा बाँटे
और क़लम के सभी कर्म हों वेणु-बजैया से निष्काम


©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)