हिंदुत्व की मौजूदा स्थिति


ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।

आज हिंदुत्व किस स्थिति में है और राजनीतिक कारणों से किस दशा में पहुंचने वाला है, इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। अब दुनिया सिर्फ धर्म और अध्यात्म से नहीं चलती है, जिसको लेकर हिंदू आज भी सिरमौर बने हुए हैं। हिंदू सिर्फ नाम है। दरअसल यह सनातन धर्म से जुड़ा मामला है, जिसकी प्रगति मनुष्य की स्वार्थी प्रवृत्ति के कारण रुक गई। जब इस देश के तमाम बुद्धिजीवी मनुष्य की बुनियादी जरूरतों को भूलकर आत्मा और परमात्मा में उलझे हुए थे, तब पश्चिमी देशों में वैज्ञानिक विकास का सिलसिला शुरू हो चुका था।

भारत में जब आध्यात्मिक विकास चरम सीमा पर पहुंचा हुआ था, तब पश्चिम में वैज्ञानिक विकास की शुरूआत हुई। यह समय की जरूरत थी कि आध्यात्मिक विकास का उचित तालमेल विज्ञान के साथ होता, लेकिन आध्यात्मिक ज्ञान के तथाकथित ठेकेदारों को लगा कि इससे उनकी दुकानदारी खत्म हो जाएगी, इसलिए उन्होंने वैज्ञानिक विकास में हर संभव रोड़े अटकाने का काम किया। वे अंधविश्वासों पर आधारित जिस समाज का निर्माण कर चुके थे और जिसमें उनकी हैसियत सिरमौर की बनी हुई थी, उसे जैसे-तैसे बनाए रखने के चक्कर में उन्होंने धर्म और समाज का बहुत नुकसान किया है। आज हिंदू सहित अनेक धर्मों के नाम पर कई अलग-अलग संप्रदाय बने हुए हैं।

हिंदुओं की यह स्थिति क्यों हुई? इसकी भी जांच करने की जरूरत है। सनातन धर्म को राजाओं और उनके पुरोहितों की मिलीभगत से ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया गया था कि एक समय ऐसा भी आया, जब लोगों ने अलग धर्म बनाकर अलग समाज के रूप में संगठित होने का सिलसिला शुरू किया। यह सिर्फ सुविधाजनक तरीके से जीवन व्यतीत करने के लिए था। लोग धर्म से परेशान नहीं थे, लेकिन धर्म के नाम पर जो धार्मिकता लादी जा रही थी, उससे परेशान थे। आखिर बौद्ध और जैन धर्म का इतना विस्तार हुआ है और अग्रवाल, माहेश्वरी जैसे अलग समाज विकसित हुए हैं तो इसके कई गंभीर कारण रहे होंगे। आज जातिवाद के आधार पर ब्राह्मण और राजपूत सबसे ऊंची जाति मानी जाती है। वैश्य इनके बाद है, क्योंकि वे अर्थव्यवस्था से जुड़े हुए हैं। बाकी अन्य जातियों को शिक्षित होने के बावजूद निचले दर्जे की माना जाता है।

हिंदुत्व की विचारधारा महान है, इसमें कोई दो राय नहीं है, लेकिन बड़ी संख्या में लोग हिंदू धर्म छोड़कर अन्य धर्मों में शामिल हो गए हैं, यह भी एक तथ्य है। अब बात हो रही है कि जिन हिंदुओं ने धर्म बदल लिया है, उन्हें वापस हिंदू बनाना है, तो क्या यह संभव है? धर्म और अध्यात्म के अलावा और भी कई विषय जीवन के साथ जुड़ गए हैं। विज्ञान तो पहले नंबर पर है ही, समाज शास्त्र भी है, भूगोल भी है, राजनीति शास्त्र भी है, गणित भी, प्रौद्योगिकी भी, और भी तमाम विषय हैं, जिनका विकास करने की सुध उन पुरोहितों को कभी नहीं आई, जो राजाओं के साथ मिलीभगत करके समाज के रीति-रिवाज तय करने में लगे हुए थे।

साफ शब्दों में इस पूरे जंजाल को सुलझाने के लिए कुछ कहा जाए तो यही कहा जा सकता है कि यह सब स्त्रियों को लेकर हुआ। सबसे ज्यादा रीति-रिवाज स्त्रियों को लेकर ही बने हैं। अगर यह कहें कि जातिगत आधार पर धर्म का पालन करने की जिम्मेदारी पूरी तरह स्त्रियों को सौंप दी गई है तो गलत नहीं होगा। स्त्रियां पर पुरुषों से संबंध नहीं रखें। वे पुरोहित का काम नहीं कर सकती। वे युद्ध कर्म में भाग नहीं ले सकती। उन्हें पति को परमेश्वर मानना जरूरी है। स्त्रियों के लिए उनका पति ही परमेश्वर बताया जाता है। अन्य किसी पुरुष से यौन संबंध बनाने वाली स्त्री कुलटा कहलाती है। चरित्रहीन बताई जाती है। पुरुषों के लिए चरित्र का महत्व नहीं है, जितना स्त्रियों के लिए है। उन्हें कैसे वस्त्र पहनना है। कितना हंसना है, कितना बोलना है, उनके हर कदम को ऐसे धार्मिक अनुशासन में बांधा गया है, जिसका कोई हिसाब नहीं।

भारतीय पुरुषों को अपना पौरुष साबित करना होता है तो वह स्त्रियों के माध्यम से ही साबित हो पाता है। कई भारतीय पुरुष पौरुष का अर्थ ही यही समझते हैं कि वे अपने अधीन रहने वाली स्त्रियों का किस प्रकार उपयोग करते हैं। स्त्रियों को राजाओं का मनोरंजन करने के लिए नाचने में लगाया गया। राजाओं के रनिवास होते थे। एक राजा कई स्त्रियों से विवाह कर सकता था। कई दासियों को अपनी सेवा में रख सकता था। इस देश में बहुत से राजा हुए हैं और वे सभी विष्णु के अवतार नहीं थे। कई राजा अत्यंत कामुक भी हुए हैं, जिनको लेकर तरह-तरह की लोककथाएं हैं। कई राजाओं के शासन में एक अलग विभाग होता था, जिसमें पौरुष वर्धक जड़ी-बूटियों पर अनुसंधान करके दवाएं बनाई जाती थी। स्तंभन, वशीकरण की क्षमता का विकास करने के लिए भारत में बहुत माथापच्ची हुई है।

खजुराहो के मंदिरों में, अजंता-एलोरा की गुफाओं में जो स्त्री-पुरुष की विभिन्न मुद्राओं में प्रतिमाएं गढ़ी गई हैं, वे अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि उस काल में मूर्तिकारों की मानसिकता कहां तक पहुंची हुई थी। मंदिरों की बाहरी दीवारों पर उकेरी गईं संभोगरत प्रतिमाओं की व्याख्या कई तरह से की जाती है। कोई कहता है कि ये प्रतिमाएं तंत्र आधारित हैं। कोई कहता है कि स्त्री-पुरुष के संबंधों पर आधारित है। यह भी कहा जा सकता है कि जब ये प्रतिमाएं बनीं, उस समय ज्यादातर लोग इतने वीतराग हो चुके थे या अत्यंत कठोर रीति-रिवाजों के कारण स्त्री-पुरुष संबंधों के प्रति इतने उदासीन हो चुके थे कि उन्हें साथ जोड़े बनाकर वंश आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से इस तरह की प्रतिमाएं मंदिरों के बाहर बनाई गई। कुछ भी हो सकता है, लेकिन जो है, वह साक्षात है।

यह सब हिंदुओं के अंतर्गत ही है और मानना पड़ेगा। यहां ब्रह्मचर्य के महत्व के साथ ही कामसूत्र भी है और तरह-तरह के जाति-आधारित रीति-रिवाज भी हैं। एक हिंदू के जीवन में इन सब बातों का उचित संतुलन होना चाहिए। हिंदू समाज में मौजूद तरह-तरह की भ्रांतियों और स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर बने कठोर रीति-रिवाज का परिणाम ही है कि आज हिंदू कई भागों में, कई पंथों में, कई विचारधाराओं में, कई संप्रदायों में बंटा हुआ है। हिंदुत्व के नाम पर नया राजनीतिक दर्शन बहुत बाद में सामने आया, जब अंग्रेजों ने धर्म के आधार पर इस देश को बांटने का प्रयास शुरू किया। हिंदुत्व के नाम पर पहली बार अंग्रेजों के खिलाफ प्रबल विरोध 1857 में भड़का था। उसके बाद अंग्रेजों ने अपनी नीतियां बदलकर भारत में अपनी तरह का समाज गढ़ने के लिए अपने शासन के अनुकूल शिक्षा प्रणाली लागू की, ईसाई मिशनरियों को शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र से जोड़ा और भारत में अपने हिसाब से समाज की रचना करने के लिए भारी भरकम निवेश किया। इस दौरान व्यापक हिंदू समाज भी कई बदलाव शुरू हुए, जो अभी तक जारी हैं। 

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)