मुगल साम्राज्य
ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।
भारत में मुगल साम्राज्य की शुरूआत 1526 में बाबर से होती है, जब उसने पानीपत की लड़ाई में इब्राहिम लोदी को हरा दिया था। वह तैमूर राजवंश का राजकुमार था और सबसे पहले उसने सिंधु नदी की घाटी पर अपना शासन स्थापित किया था। तब बाबर ने पहली बार युद्ध में तोपों का इस्तेमाल किया था। अपने नए राज्य को सुरक्षित करने के लिए उसे खानवा के युद्ध में चित्तौड़ के राणा सांगा का मुकाबला करना पड़ा। राणा सांगा की छोटी सी सेना ने बाबर की विशाल सेना को हरा दिया था और बाबर को राणा सांगा से संधि करनी पड़ी थी। 1530 में बाबर का बेटा नसीरुद्दीन मोहम्मद हुमायूं उत्तराधिकारी बना लेकिन वह पख्तून राजा शेरशाह सूरी के रहते अपने राज्य का विस्तार नहीं कर पाया। 1540 में हुमायूं निर्वासित शासक बना, हालांकि भारत में कुछ किले और थोड़ा-बहुत क्षेत्र हुमायूं के अधिकार क्षेत्र में थे।
शेरशाह सूरी के निधन के बाद 1555 में हुमायूं फिर सेना जुटाकर भारत पहुंचा और उसने दिल्ली पर कब्जा कर लिया। हुमायूं के बेटे का नाम जलालुद्दीन था, जो बाद में अकबर नाम से प्रसिद्ध हुआ। अकबर को 14 फरवरी 1556 को दिल्ली की सल्तनत के लिए सिकंदर शाह सूरी के खिलाफ युद्ध के दौरान हुमायूं का उत्तराधिकारी नियुक्त किया गया था। अकबर ने 21-22 वर्ष की उम्र में अपनी 18वीं जीत हासिल की थी। जल्दी ही वह भारतीय वातावरण को समझने लगा था, इसलिए अपने साम्राज्य को सुरक्षित बनाए रखने के लिए उसने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई। उसने राजपूतों से संबंध जोड़ा। एक राजपूत राजकुमारी जोधाबाई से विवाह किया और अपनी सेना में हिंदू अधिकारियों को नियुक्त किया।
अकबर ने अपनी कूटनीति से तमाम राजपूत राजाओं को अपने अधीन कर लिया था, लेकिन महाराणा प्रताप ने उसकी अधीनता स्वीकार नहीं की। महाराणा प्रताप का पूरा नाम महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया था। वह मेवाड़ के शासक थे। अकबर महाराणा प्रताप के जीवित रहते कभी भी मेवाड़ पर कब्जा नहीं कर पाया। महाराणा प्रताप ने अकबर की सेनाओं के खिलाफ कई छापामार लड़ाइयां लड़ीं। 1556 से 1605 के दौरान अकबर के शासन का विस्तार हुआ और उसको काफी मजबूती मिली। 1605 से 1627 के दौरान अकबर के पुत्र नूरुद्दीन मोहम्मद जहांगीर ने मुगल सल्तनत की कमान संभाली। जहांगीर के बारे में कहा जाता है कि वह पक्का शराबी हो गया था और उसकी पत्नी नूरजहां पर्दे के पीछे से शासन संभालती थी। जहांगीर के बाद शहाबुद्दीन मोहम्मद शाहजहां बादशाह बना। इससे पहले वह खुर्रम नाम से जाना जाता था। शाहजहां को एक विशाल साम्राज्य विरासत में मिला था। उस समय विश्व में शायद यह सबसे बड़ा साम्राज्य था। इसी दौरान शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज महल के निधन के बाद उसकी याद में 1630 से 1653 के दौरान आगरा में ताजमहल का निर्माण करवाया था, जहांगीर की मजार बनवाई थी और लाहौर में शालिमार बाग का निर्माण करवाया था। मुमताज महल की मौत अपने 14वें बच्चे को जन्म देते समय हुई थी।
ईसवी सन 1700 तक मुगल साम्राज्य का विस्तार चरम सीमा तक पहुंच चुका था। शाहजहां के बाद औरंगजेब बादशाह बना था। औरंगजेब ने सल्तनत पर कब्जा करने के लिए अपने पिता शाहजहां को पद से हटाकर कैद कर लिया था। वह अकबर की धार्मिक सहिष्णुता की नीतियों को कायम नहीं रख सका और उसने भारत पर इस्लामी शरीया कानून थोपने की कोशिश की। दक्षिण भारत में अपने शासन का दायरा बढ़ाने का प्रयास किया, जिसमें उसने बहुत संसाधन झोंक दिए। तब महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी ने औरंगजेब से लोहा लिया था और उनकी छापामार युद्ध तकनीक से औरंगजेब की सेनाएं परेशान रहती थीं।
औरंगजेब की नीतियों का मराठाओं, पंजाब के सिखों और हिंदू राजपूतों ने जमकर विरोध किया जिससे मुगल साम्राज्य की नींव हिलने लगी थी। हिंदुओं को प्रताडि़त करने की उसकी नीतियों के कारण उसके दुश्मन भी बहुत हो गए थे। तीन मार्च 1707 को औरंगजेब के निधन के बाद बहादुर शाह जफर प्रथम उर्फ शाह आलम प्रथम बादशाह बना। वह फरवरी 1712 में अपने निधन तक बादशाह रहा। उसके बाद करीब एक साल जहांदर शाह ने सल्तनत संभाली। उसके बाद फर्रूखसियर बादशाह बना। उसने अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल में शुल्क मुक्त व्यापार करने का फरमान जारी कर किया और इस तरह अंग्रेजों के भारत में प्रवेश का रास्ता बना। फर्रूखसियर के छह साल बाद रफी उल-दर्जात कुछ माह सल्तनत का प्रभारी रह पाया, उसके बाद रफी उद-दौलत उर्फ शाहजहां द्वितीय बादशाह बना। कुछ ही महीनों में उसकी भी मौत हो गई और फिर निकुसियर बादशाह बना। उसने भी 1719 में कुछ समय सल्तनत संभाली। इसके बाद कुछ समय मोहम्मद इब्राहिम बादशाह बना रहा।
शाहजहां द्वितीय, निकुसियर और इब्राहिम के बादशाह रहते मुगल सल्तनत पर मोहम्मद शाह का दबदबा बना रहा। शाहजहां द्वितीय की मौत के बाद 1719-1720 में निकुसियर और इब्राहिम को तख्त से हटाकर उसने खुद ने सल्तनत संभाल ली थी। वह 1748 तक बादशाह बना रहा। 1739 में मोहम्मद शाह के शासन काल में ही पर्शिया के क्रूर हमलावर नादिर शाह ने दिल्ली पर हमला किया था। 1748 से 1754 तक अहमद शाह बहादुर ने सल्तनत संभाली। उसके बाद 1754 से 1759 तक आलमगीर द्वितीय बादशाह रहा। फिर कुछ महीने शाहजहां तृतीय के तख्त संभालने के बाद 1759 में शाह आलम द्वितीय ने सल्तनत संभाली और 1806 तक बादशाह रहा। उसी के शासनकाल में 1761 में अहमद शाह अब्दाली ने दिल्ली पर हमला किया था। उसी के शासनकाल में बंगाल, बिहार और उड़ीसा में ईस्ट इंडिया कंपनी को अधिकार सौंपे गए। 1803 में उसने ईस्ट इंडिया कंपनी की अधीनता स्वीकार कर ली थी। 1806 में शाह आलम द्वितीय के निधन के बाद अकबर शाह द्वितीय 1806 से 1837 तक अंग्रेजों के अधीन दिल्ली की मुगल सल्तनत का बादशाह बना रहा। उसके बाद 1837 में बहादुर शाह जफर द्वितीय ने तख्त संभाला। 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह भड़कने पर ब्रिटिश सल्तनत ने उसे तख्त से हटाकर बर्मा (अब म्यांमार) भेज दिया और खुद ने भारत का शासन संभाल लिया।
यह भारत में मुगल सल्तनत के बारे में संक्षिप्त विवरण है। मौर्य वंश, गुप्त वंश, शक, हूण आदि के शासनकाल से गुजरते हुए इस देश में ईसवी सन 600 के बाद इस्लाम का प्रवेश हुआ। इस्लाम के अनुयायियों को भी इस धर्म प्रधान देश में फैलने, पसरने के लिए पर्याप्त जगह मिली। ईसवी सन 1206 से लेकर 1526 तक करीब 300 वर्षों के दौरान दिल्ली सल्तनत पर पांच मुसलमान राजवंशों गुलाम (1206-90), खिलजी (1290-1320), तुगलक (1320-1413), सईद (1414-51) और लोदी (1451-1526) राजवंश शासन कर चुके थे। इसके बाद 1526 में तुर्की से आए तैमूर वंशीय बाबर ने यहां शासन करना शुरू किया तो मुगल वंश का शासन तीन सदी बाद तक चला।
मुगल शासन को अंग्रेजों ने अपनी कूटनीति से यहां के राजाओं, जमीदारों, नवाबों की कमजोरियों के आधार पर उन्हें अपने बुद्धिबल से दबाव में लेते हुए दीमक की तरह इस देश में समाज के भीतर सेंध लगाई। इसका नतीजा सामने है। अंग्रेज 1857 से 1947 तक दो शताब्दियों के दौरान इस देश का तिया-पांचा करके देश को खूंखार नफरत से भरे माहौल में दो टुकड़े करने के बाद ब्रिटिश मार्गदर्शन में लोकतांत्रिक शासन का रास्ता बनाकर चले गए हैं। इस घटना के 72 साल गुजरने के बाद देखिए देश कहां आ पहुंचा है? निश्चित तौर पर इस देश में राजनीतिक चेतना का विकास उसी तरह करने की जरूरत है, जैसी गांधीजी के समय थी, जब भारत के लोग अंग्रेज सरकार को उखाड़ फेंकने के जुनून से भरे हुए थे। अब हमें अपना भला बुरा सोचते हुए राजनीतिक रूप से जागरूक होने की जरूरत है।
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)


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