भारत में इस्लाम का आगमन  


ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।

हिंदुत्व के बारे में विचार करते समय मुसलमानों का जिक्र जरूरी है। ये कैसे भारत में आए और कैसे इन्होंने सल्तनत कायम की। मुसलमानों के आने तक इतिहास का दस्तावेजीकरण शुरू हो चुका था, जिससे आज भी उस समय की उल्लेखनीय घटनाएं तथ्यात्मक रूप से उपलब्ध हैं।

भारत में इस्लाम का आगमन ईसवी सन 629 में हुआ था। इस समय भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार मुसलमानों की संख्या 17.2 करोड़ है जो कि देश की कुल जनसंख्या का 14.2 फीसदी है। भारत दुनिया का तीसरा देश है, जहां इंडोनेशिया और पाकिस्तान के बाद मुसलमानों की आबादी सबसे ज्यादा है। ज्यादातर मुसलमान भारतीय हैं, लेकिन कुछ बाहर के भी हैं, जिनमें फारस और मध्य एशिया के मुसलमान शामिल हैं। मुसलमानों के भारत में आगमन के बाद ईसवी सन 711 में मोहिम्मद बिन कासिम ने पहली बार पश्चिमोत्तर भारत पर हमला किया था और 712 में सिंध और मुल्तान पर कब्जा कर लिया था। उसके बाद दाहिर इन दोनों प्रांतों का शासन बना। ईसवी सन 1001 से 1027 तक महमूद गजनवी ने 11 बार भारत में हमले किए। महमूद गजनवी के हमले का पहली बार सामना करने वाला पंजाब का राजा जयपाल था। वैहिंद के पास गजनवी से युद्ध करते हुए पराजित होने के बाद उसने आत्महत्या कर ली थी। गजनवी ने 1025-26 में 16वें हमले में गुजरात के सोमनाथ मंदिर को लूटा था। उसने 17वां हमला 1027 में जाटों और खोखरों पर किया था। 30 अप्रैल 1030 को सुल्तान महमूद गजनवी की मौत हो गई।

इसके बाद भारत के विभिन्न इलाकों में मुसलमानों के हमलों का सिलसिला जारी रहा। ईसवी सन 1175 में मोहम्मद गोरी ने पहली बार मुल्तान पर हमला किया। 1176 में उसने उच्छी के भट्टी-राजपूतों पर दूसरा हमला किया। तीसरा हमला उसने 1178 में गुजरात के अन्हिलवाड़ा पर किया था, जिसमें उसे तत्कालीन राजा मूलराज द्वितीय से पराजित होकर भागना पड़ा। 1191 में मोहम्मद गोरी ने तराइन क्षेत्र में हमला किया, जिसमें उसे अजमेर के शाकंभरी वंश के शासक पृथ्वीराज चौहान तृतीय से बुरी तरह पराजित होना पड़ा। इतिहास में इसे तराइन का पहला युद्ध कहा गया है।

तराइन का दूसरा युद्ध 1192 में हुआ, जिसमें पृथ्वीराज चौहान को मोहम्मद गोरी ने पराजित कर दिया। उसके बाद उसने दिल्ली और अजमेर के आसपास के इलाकों पर कब्जा करते हुए दिल्ली में सल्तनत कायम करने का रास्ता मजबूत किया। 1194 में उसने कन्नौज के राजपूत राजा जयचंद को चंदावर के युद्ध में परास्त कर दिया था। इसके बाद मोहम्मद गोरी के सैन्य जनरल कुतुबुद्दीन एबक ने गुजरात, सिरोही, कोटा, बूंदी, उज्जैन और कलिंजर पर कब्जा कर लिया। गोरी के एक अन्य सैन्य जनरल बख्तियार खिलजी ने पूर्वी भारत पर हमले किए और बिहार की तत्कालीन राजधानी ओदंतपुरी के साथ ही नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों को नष्ट कर दिया। 1199 में बख्तियार खिलजी ने लक्ष्मण सेन को हरा कर बंगाल पर कब्जा कर लिया। 15 मार्च 1206 को गोर लौटते समय मोहम्मद गोरी को रास्ते में खोखरों ने मार दिया था।

मोहम्मद गोरी को दिल्ली में मुस्लिम सल्तनत की स्थापना के लिए जिम्मेदार माना जाता है। दिल्ली सल्तनत पर ईसवी सन 1206 से लेकर 1526 तक करीब 300 वर्षों के दौरान पांच राजवंशों ने शासन किया। ये थे गुलाम राजवंश (1206-90), खिलजी राजवंश (1290-1320), तुगलक राजवंश (1320-1413), सईद राजवंश (1414-51) और लोदी राजवंश (1451-1526)। कुतुबुद्दीन एबक ने गुलाम राजवंश की स्थापना की थी। गुलाम वंश का शासन खत्म होने के बाद 1590 में जलालुद्दीन खिलजी ने सल्तनत संभाली। जलालुद्दीन खिलजी को उसी के भतीजे अलाउद्दीन ने मार डाला और 1296 में खुद सुल्तान बन बैठा। इसके बाद उसने खिलजी राजवंश का चौतरफा विस्तार किया। उसने कई लड़ाइयां लड़ी और गुजरात, रणथंभौर, चित्तौड़, मालवा और दक्षिण के राजाओं को परास्त किया। उसने मुस्लिम सल्तनत का दायरा दक्षिण भारत तक पहुंचा दिया था। उसके 20 वर्ष के शासनकाल में कई बार मंगोलों ने हमले किए, लेकिन उन्हें हर बार मुंह की खानी पड़ी। 

ईसवी सन 1316 में अलाउद्दीन खिलजी की मौत होने के बाद गयासुद्दीन तुगलक ने सल्तनत संभाली और उसने 1320 से तुगलक राजवंश का शासन स्थापित किया। अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में वह पंजाब का राज्यपाल था। गयासुद्दीन तुगलक ने सुल्तान बनने के बाद वारंगल जीता और बंगाल में बगावत की। गयासुद्दीन के बाद उसका पुत्र मोहम्मद बिन तुगलक सुल्तान बना और उसने सल्तनत का दायरा मध्य एशिया तक बढ़ाया। तुगलक के शासनकाल में भी मंगोलों ने हमले किए थे, लेकिन फिर हार गए।

मोहम्मद बिन तुगलक ने अपनी राजधानी दिल्ली से हटाकर दक्षिण में देवगिरी में स्थापित कर ली थी। दो साल बाद राजधानी फिर दिल्ली लाई गई। 1351 में मोहम्मद बिन तुगलक की मौत हुई। उसका चचेरा भाई फिरोज तुगलक सुल्तान बना। उसने शांति से शासन किया। 1388 में फिरोज तुगलक की मौत के बाद तुगलक राजवंश ढलान के रास्ते पर आ गया। 1398 में तैमूर लंग ने दिल्ली पर हमला कर दिया था। तैमूर लंग के हमले के बाद तत्कालीन सुल्तान महमूद तुगलक गुजरात भाग गया था। लड़ाई खत्म होने के बाद वह दिल्ली लौटा और फिर उसने कुछ वर्षों तक कई लोगों की कठपुतली बनकर शासन किया। इसके बाद तुगलक साम्राज्य का अंत हुआ। तुगलक राजवंश का अस्तित्व 1412 तक बना हुआ था।

तुगलक राजवंश के बाद 1414 से 1451 तक सैयद वंश का शासन रहा। तुर्क राजवंश से जुड़े सैयदों ने तैमूर के प्रतिनिधि के रूप में सल्तनत संभाली थी। सैयदों के बाद 1451 से 1526 तक लोदी राजवंश की सल्तनत रही। अफगान जनजाति का बहलुल खान लोदी दिल्ली की सल्तनत संभालने वाला पहला पश्तून था। बहलुल खान के बाद उसके बेटे निजाम खान ने सल्तनत संभाली और खुद को सिकंदर लोदी के नाम से मशहूर किया। सिकंदर लोदी ने कई हिंदू मंदिर नष्ट किए। मथुरा और उसके आसपास का क्षेत्र खास तौर से उसके निशाने पर रहता था। वह अपनी राजधानी दिल्ली से आगरा ले गया था। 1517 में सिकंदर लोदी की कुदरती मौत के बाद उसका पुत्र इब्राहिम लोदी सुल्तान बना। उसने अपने बड़े भाई जलाल खान की हत्या की। जलाल खान की मौत के बाद पंजाब का सूबेदार दौलत खान लोदी मुगल बाबर के पास पहुंच गया और उसको दिल्ली सल्तनत पर हमला करने के लिए उकसाया। 1526 में बाबर ने पानीपत की लड़ाई में इब्राहिम लोदी को मार दिया और उसके बाद मुगल सल्तनत का शासन स्थापित हुआ। 

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)