सुनो
तुम्हीं ने कहा था ना
कि जब-जब भी होगी
धर्म की हानि
तुम आओगे
अब क्या
तुमको दिख नहीं रहा
कि
हमारी ख़ुशियों की गेंद
कहीं डूब गयी है
रुक रहा है
हमारा खेल
गिरने-उठने
और
आगे बढ़ते जाने का
नीला पड़ रहा है
हमारे मन का जल
आ जाओ
अब तो
आ ही जाओ
निकाल के दो
हमें हमारी गेंद
फिर से मर्दन करो
इस कालिय का
जिसने
भ्रमित कर दी है
हमारी वह दृष्टि
जो कर लेती थी भेद
धर्म और अधर्म का
साफ़ कर दो
हमारा मन-जल
इससे पहले
कि ये
नीले से काला होकर
सूख जाये !
लोकेश कुमार सिंह
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)


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