एकता में अनेकता और धार्मिक बदलाव 

ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।  

हिंदुत्व शब्द से हिंदुओं के स्वभाव, व्यवहार, जीवन शैली आदि का संकेत मिलता है। वह सदियों से लगभग समान रही है। सभी हिंदुओं की अलग-अलग जातियां हैं और इनमें आपस में जमकर विवाद चलता रहता है। फिर भी जीवन जीने का तरीका लगभग समान है। जन्म, परण और मरण से संबंधित रीति-रिवाजों में भिन्नता होने के बावजूद उनका वैदिक आधार बना हुआ है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, हनुमान, लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, दुर्गा के अलग-अलग स्वरूप, पार्वती, गणेश आदि हिंदुओं के जीवन के आधार हैं। इनसे जुड़ी असंख्य पौराणिक कथाएं हैं। हिंदुओं की हर जाति में इन देवी-देवताओं के प्रति अटूट आस्था पाई जाती है। सनातन धर्म का पहला चरण वेद है, दूसरा चरण उपनिषद और तीसरा चरण है पुराण। इस मान्यता में कोई भेदभाव नहीं है।  

सारे हिंदू सनातन धर्मी हैं। सनातन धर्म संगठित धर्म नहीं है। यह वेदों पर आधारित है और वेदों की रचना कई ऋषियों के प्रयासों से मानी जाती है। उन पर किसी एक ऋषि विशेष का कापीराइट नहीं है। वेदों की रचना के बाद अन्य ऋषियों ने उनकी व्याख्याएं की और उनके भाष्य लिखे, जिसके परिणाम स्वरूप पुराणों की रचना हुई। वेद जहां सत्य की घोषणा करने वाला साहित्य है, वहीं पुराण भक्ति ग्रंथ के रूप में रचे गए हैं। पुराणों में विषयों की सीमा नहीं है। इसमें ब्रह्मांड विद्या, देवी-देवताओं, राजाओं, नायकों, ऋषि-मुनियों की वंशावली, लोककथाएं, तीर्थयात्रा, मंदिर, चिकित्सा, खगोल शास्त्र, व्याकरण, खनिज विज्ञान, हास्य, प्रेम कथाओं के साथ ही धर्मशास्त्र और दर्शन का भी विवरण है।

पुराणों के रचनाकार अज्ञात हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि कई रचनाकारों के माध्यम से पुराणों को आकार लेने में सदियां लगी हैं। जैनियों के अपने अलग पुराण हैं, जिनमें रचनाकाल और रचनाकारों के नाम स्पष्ट बताए गए हैं। पुराण प्रमाण ग्रंथ नहीं है। ये जनमानस को शिक्षा देने के लिए रचे गए हैं। पुराणों में अलग-अलग देवी-देवताओं को केंद्र में रखकर पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म और कर्म-अकर्म की कथाएं रची गई हैं। पुराणों की संख्या 18 मानी जाती है। ये हैं ब्रह्म, पद्म, विष्णु, शैव (वायु), भागवत, नारद, मार्कंडेय, अग्नि, ब्रह्मवैवर्त, लिंग, वाराह, स्कंद, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड़ और ब्रह्मांड। विष्णु पुराण में इन 18 पुराणों को महापुराण कहा गया है। पांच पुराणों, मत्स्य, वायु, विष्णु, ब्रह्मांड और भागवत में राजाओं की वंशावली का विवरण है। भागवत पुराण के दो स्वरूप हैं, श्रीमद्भागवत और देवी भागवत।

भारत में ब्राह्मणों के माध्यम से लोगों को पौराणिक ज्ञान मिलता रहा है। ब्राह्मणों का गुजर-बसर राजाओं से होता रहा है, इसलिए उन्होंने राजाओं को प्रसन्न रखने के लिए भी बहुत सा साहित्य रचा है, जिससे वेदों के सिद्धांत अलग धरे रह गए और सनातन धर्म के बारे में गोलमोल अविश्वसनीय लगने वाली बातें फैलने लगीं। खास तौर से महाभारत के बाद यह धांधली इतनी ज्यादा बढ़ी कि कालांतर में कई लोगों का सनातन धर्म से भरोसा टूटने लगा। महाभारत कालीन ऋषि वेद व्यास ने पुराणों का पुनर्लेखन किया था। इसके बाद भी कई तरह से कई रूपों में पुराणों की व्याख्या होती रही और 18 पुराणों के अलावा अन्य नए पुराण भी रचे गए।

इस पूरी धांधली में महादेव शिव की उपेक्षा करते हुए उनके बारे में तरह-तरह की बातें प्रचारित की गईं। ब्रह्मा की विवादित छवि बनी और विष्णु को सर्वोच्च स्तर के भगवान बताते हुए राजा को भगवान विष्णु का स्वरूप माना गया। राजा के विरोध की तुलना विष्णु के विरोध से की जाने लगी, जिससे सनातन धर्म में कई नए संप्रदाय बने। पूरी भारतीय विचारधारा पर वैष्णवों का प्रभुत्व हुआ। तुलसीदास की रामचरित मानस और श्रीमद्भागवत को प्रमाण मानते हुए इनकी कथाएं इस तरह प्रचारित हुई कि कई लोग सिर्फ रामचरित मानस का पाठ करते हुए महान संत घोषित हो चुके हैं और कई लोग भागवतकथा पढ़ते-पढ़ते हिंदू धर्म के स्टार प्रचारक बने हुए हैं।

ये दोनों ग्रंथ खास तौर पर विष्णु का महत्व प्रमाणित करते हैं। इसके बाद यह मान्यता रूढ़ हुई है कि भारतभूमि का असुरों से उद्धार करने के लिए भगवान विष्णु समय-समय पर अवतार लेते रहे हैं और भोले भगवान महादेव से वरदान प्राप्त असुरों के आतंक से प्रजा को मुक्ति दिलाते रहे हैं। इस क्रम में रावण, कंस, शिशुपाल, जरासंध आदि को असुर बताया गया है और इसका भी विस्तार से वर्णन किया गया है कि कृष्ण ने बचपन में मारने के लिए भेजे गए विभिन्न असुरों का किस प्रकार संहार किया। इसमें बकासुर, नरकासुर आदि का उल्लेख किया जाता है। इसी प्रकार रामचरित मानस में राम को मारने के लिए पहुंचे विभिन्न राक्षसों के मारे जाने की बात है।

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि जितने भी आदिवासी और अनुसूचित जातियों से जुड़े लोग हैं, उनमें से ज्यादातर शिव या शिव परिवार के किसी देवता के भक्त हैं। वे महादेव की आराधना करने वाले लोग हैं। उन्हें समाज में ऊंच-नीच की भावना फैलाकर सामाजिक प्रतिष्ठा से वंचित करने का काम हुआ है। सनातन धर्म को लेकर बनी इन धारणाओं में वेदों का वस्तुनिष्ठ ज्ञान बहुत पीछे छूटा हुआ दिखाई देता है।

महाभारत के बाद बौद्ध और जैन धर्म के अस्तित्व में आने तक सनातन धर्म की स्थिति काफी बदल चुकी थी। जातिवाद और उसके आधार पर भयानक कुरीतियां फैल चुकी थीं। ब्राह्मण पूरे समाज पर अपना बौद्धिक आतंक स्थापित कर चुके थे। जनता में कई तरह के अंधविश्वास रूढ़ हो चले थे। कई लोगों का झुकाव सनातन धर्म से हटकर बौद्ध और जैन धर्म की ओर होने लगा था। इस तरह जब सनातन धर्म एक बार फिर संकट में पड़ने लगा, तब आदि शंकराचार्य का उदय हुआ।

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)