समानता और सामाजिक भेदभाव

ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।  

पहले मनुष्य का जन्म हुआ। स्त्री और पुरुष के संयोग से उसका परिवार बना। उसके बाद उसकी बुद्धि से समाज बना। एक जोड़ा बनने के बाद जैसे-जैसे अन्य जोड़े बनने लगे वैसे ही नए मनुष्यों का जन्म होने लगा। इस तरह समाज बना। समाज की व्यवस्थाएं बनीं। सामाजिक रूप से जीवन यापन के तौर-तरीके विकसित किए गए। वह समाज आज यहां तक विकसित और विस्तारित हो चुका है कि अब समेटने में नहीं आ रहा है। प्रकृति प्रदत्त जितने साधन-संसाधन धरती पर हैं, सभी पर मनुष्य का अधिकार है और उनका जमकर दुरुपयोग हो रहा है।

जब सबसे पहले मनुष्य का जन्म हुआ होगा तो स्त्री-पुरुष के संभोग से ही हुआ होगा। उसके अलावा नए मनुष्य के जन्म का कोई उपाय भी नहीं है। जब कुछ भी नहीं था, सिर्फ तमाम प्राणियों से परिपूर्ण यह धरती थी, उसमें किसी भी तरह मनुष्य बन गया। खुदा ने भेजा हो या म्यूटेशन से विकसित हुआ हो। पहला मनुष्य तो बना ही था। हम सभी जीवित मनुष्यों की धरती पर उपस्थिति इसका साक्षात प्रमाण है।

अब यहां सवाल है कि सबसे पहले जो मनुष्य बना, वह पुरुष था या स्त्री, या पहले पुरुष बना और स्त्री को पैदा करने के बाद उससे संभोग करने लगा। या पहले स्त्री बनी और उसने किसी तरह गर्भधारण करने के बाद पुरुष को जन्म दिया। कुछ भी हो सकता है। कुछ तो हुआ ही होगा। कार्य-कारण संबंधों का विचार करें तो मनुष्य के जन्म का कोई कारण अवश्य रहा होगा। तमाम धर्म इसके अलग-अलग कारण बताते हैं।

हमारी उम्र बहुत कम है। सौ डेढ़ सौ साल से ज्यादा तो बिलकुल नहीं। अगर कोई इससे भी ज्यादा जीवित रह जाए तो उसमें अतिरिक्त अमानवीय क्षमता होगी। ऐसे प्रमाण भी कहीं-कहीं हैं। हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों में धरती पर लंबे समय से रहने वाले महामानवों की उपस्थिति बताई गई है। भारत की पौराणिक गाथाओं में सात व्यक्ति अमर हैं। वे या तो किसी वरदान से या श्राप से अमरत्व प्राप्त हैं। हम भारत में इस समय चल रही हिंदुत्व की विचारधारा पर विचार कर रहे हैं, जिसे सांप्रदायिक कट्टरता में परिवर्तित करने का प्रयास किया जा रहा है।

गंभीरता से विचार किया जाए तो यही निष्कर्ष सामने आता है कि सभी मनुष्य समान हैं और उनमें उनके अपने व्यक्तित्व और विचारधारा के आधार पर भेदभाव हैं। अगर प्रेम है तो मनुष्यों के बीच सांप्रदायिकता के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। अगर होता है तो इसके पीछे द्वेष की भावना अवश्य है। एक मनुष्य दूसरे से द्वेष करता है, इसलिए भेदभाव पैदा होता है। यह भेदभाव कट्टरता में बदल जाता है। यह कट्टरता धर्म के आधार पर क्यों?

हिंदुओं ने पहले से ऊंची जाति, नीची जाति, विष्णु, शिव, शक्ति दुर्गा आदि के नाम से मनुष्यों में आपस में भेदभाव करने के लिए तरह-तरह की कट्टरता बना रखी है। इस कट्टरता के चलते आत्मा और परमात्मा के बारे में कपोल-कल्पित रचनाएं करके एक विशाल भ्रमजाल पहले ही बनाया जा चुका है। विकास और विनाश के सभी कारण मनुष्य ने स्वयं अपनी बुद्धि से उत्पन्न कर लिए हैं। ऐसे में नए विषय खोजकर उनके आधार पर नई तरह की कट्टरता पैदा करना क्या उचित है?

अगर यह सिर्फ कुछ वर्ष एक भूभाग पर अपनी सत्ता स्थापित करने के लिए है तो इससे मानवता का कौनसा भला होने वाला है? हम धर्मपरायण हिंदू होने के नाते रावण, कंस, दुर्योधन, जरासंध, शिशुपाल जैसे लोगों को अधर्मी मानकर निंदा करते हैं। वे भी तो यही करते थे। आज अगर कोई यह कहे कि वह बुरी ताकतों को खत्म करने के लिए चुनाव जीतना चाहता है, भ्रष्टाचार खत्म करना चाहता है, धन को काला और सफेद मानकर उसमें संतुलन बनाना चाहता है तो इसका क्या मतलब है? लोकतंत्र में लोग चुनाव से पहले कही गई बातों के आधार पर नेता चुन लेते हैं। अगर वह नेता चुनाव के बाद विपरीत आचरण करने लगे और लोगों की मुसीबतें बढ़ जाएं तो ऐसे लोग किस श्रेणी के माने जा सकते हैं?  

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)